
Devuthani Ekadashi: हिंदू पंचांग के अनुसार, देवउठनी एकादशी (जिसे प्रबोधिनी एकादशी भी कहा जाता है) कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है। यह वही दिन है जब भगवान विष्णु चार महीने के योगनिद्रा काल के बाद क्षीरसागर से जागते हैं। इस दिन से शुभ कार्यों जैसे विवाह, गृह प्रवेश और अन्य मांगलिक समारोहों की शुरुआत मानी जाती है।
राजा की तपस्या और अधूरी प्रतीक्षा
प्राचीन काल में एक पराक्रमी राजा था, जो अत्यंत धार्मिक प्रवृत्ति का था। उसने निश्चय किया कि जब तक भगवान विष्णु स्वयं उसके सामने प्रकट नहीं होंगे, वह प्रतिवर्ष देवउठनी एकादशी का व्रत करता रहेगा। वर्षों बीत गए, ऋतुएं बदलीं, लेकिन भगवान के दर्शन नहीं हुए। राजा ने अपने राजसी सुख त्याग दिए, तप किया, यज्ञ किए, और अनेक साधु-संतों की सेवा की, फिर भी वह दर्शन से वंचित रहा।
एक साधारण माली की सच्ची भक्ति
उसी नगर में एक गरीब माली रहता था। उसका जीवन सादगी से भरा था, परंतु उसके मन में भगवान के प्रति अटूट प्रेम था। देवउठनी एकादशी के दिन उसने अपने छोटे से घर में भगवान विष्णु की मूर्ति को फूलों और तुलसीदल से सजाया। उसने सच्चे मन से प्रार्थना की — “प्रभु, मेरे पास धन या वैभव नहीं, बस एक सच्चा मन है, जिसे मैं आपके चरणों में समर्पित करता हूं।” रात में भगवान विष्णु स्वयं माली के सपने में प्रकट हुए और बोले — “वत्स, तुम्हारी सच्ची भक्ति ने मुझे प्रसन्न कर दिया है। मैं तुम्हें दर्शन देकर तुम्हारे जीवन को धन्य करता हूं।”
राजा की जिज्ञासा और भगवान का उत्तर
अगले दिन जब नगर में यह समाचार फैला कि भगवान ने एक साधारण माली को दर्शन दिए हैं, तो राजा अत्यंत आश्चर्यचकित हुआ। ध्यान में जाकर उसने भगवान से पूछा — “प्रभु, मैंने तो वर्षों तक व्रत किया, कठोर तपस्या की, फिर भी दर्शन नहीं मिले, और एक साधारण माली को आपने दर्शन क्यों दिए?”भगवान विष्णु मुस्कुराए और बोले — “राजन, तुम्हारा व्रत नियमों से पूर्ण था, पर उसमें अहंकार का अंश था। जबकि उस माली के हृदय में केवल निष्काम प्रेम और नम्रता थी। भक्ति तब ही फल देती है जब वह अहंकार से मुक्त होती है।”
देवउठनी एकादशी का संदेश
देवउठनी एकादशी हमें यह प्रेरणा देती है कि हम अपने जीवन में भक्ति, नम्रता और सच्चे समर्पण को अपनाएं। इस दिन भगवान विष्णु और तुलसी माता की पूजा कर, आस्था और प्रेम के साथ अपने जीवन को शुभ बनाएं।