
दिवाली पर्व की शुरुआत जिस दिन से होती है, वह दिन है धनतेरस। वर्ष 2025 में धनतेरस का पर्व विशेष शुभ संयोगों के साथ 17 अक्टूबर को मनाया जाएगा। यह दिन न केवल धन-संपत्ति से जुड़ा है, बल्कि आरोग्य, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा के स्वागत का प्रतीक भी माना जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि दिवाली से ठीक पहले ही धनतेरस क्यों मनाई जाती है? इसका उत्तर छिपा है हमारे पुराणों और धार्मिक परंपराओं में।
पौराणिक कथा
धनतेरस को "धन त्रयोदशी" भी कहा जाता है, जो कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को आता है। इस दिन भगवान धन्वंतरि समुद्र मंथन से अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। वे आयुर्वेद के देवता और भगवान विष्णु के अवतार माने जाते हैं। अतः यह दिन आरोग्य और दीर्घायु की कामना के लिए अत्यंत शुभ होता है। एक अन्य मान्यता के अनुसार, इस दिन यमराज की पूजा भी की जाती है ताकि अकाल मृत्यु का भय न रहे। एक कथा के अनुसार, एक राजा के पुत्र की मृत्यु की भविष्यवाणी को उसकी पत्नी ने दीप जलाकर, सोने-चाँदी के ढेर लगाकर और भजन-कीर्तन करके टाल दिया। तभी से इस दिन दीपदान और खरीदारी की परंपरा शुरू हुई।
धनतेरस पर खरीदारी का महत्व
इस दिन लोग विशेष रूप से सोना, चाँदी, बर्तन, धातुएँ और इलेक्ट्रॉनिक सामान खरीदते हैं। यह विश्वास है कि इस दिन खरीदी गई चीजें घर में लक्ष्मी का वास लाती हैं। व्यवसायी वर्ग के लिए भी यह दिन नए हिसाब-किताब की शुरुआत और लाभ की कामना के साथ विशेष महत्व रखता है।
धार्मिक पूजन विधि
धनतेरस के दिन भगवान धन्वंतरि, कुबेर और माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है। शाम को दीपक जलाकर यमराज के नाम से दक्षिण दिशा में दीपदान किया जाता है। ऐसा करने से घर में नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है और सुख-समृद्धि का आगमन होता है।
सुखद जीवन की कामना
धनतेरस सिर्फ खरीदारी का पर्व नहीं है, यह स्वास्थ्य, समृद्धि और सुखद जीवन की कामना से जुड़ा एक आध्यात्मिक उत्सव है। दिवाली से पूर्व इसे मनाने का उद्देश्य यही है कि हम पहले आरोग्य, दीर्घायु और धन की कामना करें, ताकि दीपावली का प्रकाश हर दृष्टिकोण से पूर्णता को प्राप्त कर सके।