Dhanvantari Puja 2026: दीपावली का पांच दिवसीय उत्सव धनतेरस से आरंभ होता है। इस दिन सोना-चांदी और बर्तन खरीदने के साथ देवी लक्ष्मी और भगवान कुबेर की आराधना की जाती है। इसके अलावा आरोग्य और आयुर्वेद के अधिष्ठाता भगवान धन्वंतरि की पूजा का भी विधान है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, समुद्र मंथन के समय भगवान धन्वंतरि अमृत से भरा कलश लेकर प्रकट हुए थे। इसलिए धनतेरस को धन्वंतरि जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से उनकी उपासना करने से परिवार में सुख-समृद्धि और उत्तम स्वास्थ्य की कामना की जाती है। आइए जानते हैं साल 2026 में धन्वंतरि पूजा का शुभ समय क्या रहेगा और किस तरह से उनकी आराधना करनी चाहिए।
धनतेरस 2026 पर भगवान धन्वंतरि की पूजा का शुभ समय
इस साल धनतेरस के दिन भगवान धन्वंतरि की पूजा के लिए शाम 6 बजकर 02 मिनट से रात 7 बजकर 57 मिनट तक का समय शुभ रहेगा। वहीं प्रदोष काल शाम 5 बजकर 33 मिनट से रात 8 बजकर 09 मिनट तक रहेगा। वृषभ काल का समय शाम 6 बजकर 02 मिनट से रात 7 बजकर 57 मिनट तक निर्धारित है।
धनतेरस पर ऐसे करें भगवान धन्वंतरि का पूजन
धार्मिक परंपरा के अनुसार, धनतेरस पर भगवान धन्वंतरि की षोडशोपचार विधि से पूजा करना उत्तम माना जाता है। इस दिन निम्न तरीके से उनकी आराधना कर सकते हैं।
1.सबसे पहले पूजा स्थल की सफाई करके भगवान धन्वंतरि की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें।
2.उनके समक्ष घी का दीपक और धूपबत्ती प्रज्वलित करें।
3.भगवान को हल्दी, चंदन और अक्षत अर्पित करें।
4.इसके बाद ताजे फूल और पुष्पमाला चढ़ाएं।
5.श्रद्धापूर्वक भगवान धन्वंतरि के मंत्र का जाप करें।
6.पूजा के आखिर में आरती करें और फल या मिठाई का भोग लगाएं।
7.पूजन संपन्न होने के बाद घर के मुख्य द्वार, आंगन और अलग-अलग स्थानों पर दीपक जलाएं। इस दिन यमदेव के नाम से भी एक दीपक जलाने की परंपरा है।
भगवान धन्वंतरि का शक्तिशाली मंत्र
धनतेरस की पूजा में भगवान धन्वंतरि के इस मंत्र का श्रद्धापूर्वक जाप किया जा सकता है।
ॐ नमो भगवते महासुदर्शनाय वासुदेवाय धन्वंतराये:
अमृतकलश हस्ताय सर्व भयविनाशाय सर्व रोगनिवारणाय
त्रिलोकपथाय त्रिलोकनाथाय श्री महाविष्णुस्वरूप
श्री धनवंतरी स्वरूप श्री श्री श्री औषधचक्र नारायणाय नमः॥
भगवान धन्वंतरि की आरती
ॐ जय धन्वन्तरि देवा, स्वामी जय धन्वन्तरि जी देवा।
जरा-रोग से पीड़ित, जन-जन सुख देवा।।
स्वामी जय धन्वन्तरि देवा, ॐ जय धन्वन्तरि जी देवा ॥
तुम समुद्र से निकले, अमृत कलश लिए।
देवासुर के संकट आकर दूर किए।।
स्वामी जय धन्वन्तरि देवा, ॐ जय धन्वन्तरि जी देवा॥
आयुर्वेद बनाया, जग में फैलाया।
सदा स्वस्थ रहने का, साधन बतलाया।।
स्वामी जय धन्वन्तरि देवा, ॐ जय धन्वन्तरि जी देवा॥
भुजा चार अति सुंदर, शंख सुधा धारी।
आयुर्वेद वनस्पति से शोभा भारी।।
स्वामी जय धन्वन्तरि देवा, ॐ जय धन्वन्तरि जी देवा॥
तुम को जो नित ध्यावे, रोग नहीं आवे।
असाध्य रोग भी उसका, निश्चय मिट जावे।।
स्वामी जय धन्वन्तरि देवा, ॐ जय धन्वन्तरि जी देवा॥
हाथ जोड़कर प्रभुजी, दास खड़ा तेरा।
वैद्य-समाज तुम्हारे चरणों का घेरा।।
स्वामी जय धन्वन्तरि देवा, ॐ जय धन्वन्तरि जी देवा॥
धन्वंतरिजी की आरती जो कोई नर गावे।
रोग-शोक न आए, सुख-समृद्धि पावे।।
स्वामी जय धन्वन्तरि देवा, ॐ जय धन्वन्तरि जी देवा॥
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समुद्र मंथन से कैसे हुआ भगवान धन्वंतरि का प्राकट्य?
पौराणिक ग्रंथों में भगवान धन्वंतरि के प्रकट होने का संबंध समुद्र मंथन की घटना से बताया गया है। कथा के अनुसार, देवताओं और असुरों ने मिलकर जब क्षीरसागर का मंथन किया, तब उसमें से एक के बाद एक कई अनमोल रत्न बाहर आए। इसी प्रक्रिया के दौरान भगवान धन्वंतरि अमृत से भरा कलश लेकर प्रकट हुए थे। भगवान धन्वंतरि को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं में उन्हें आयुर्वेद का जनक और संसार का प्रथम चिकित्सक बताया गया है। उन्होंने मानव जीवन को रोगमुक्त रखने और स्वस्थ रहने के लिए आयुर्वेद का ज्ञान प्रदान किया। इसी पौराणिक प्रसंग की याद में कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को धनतेरस का पर्व मनाया जाता है। यह त्योहार हमें धन-संपत्ति के साथ अच्छे स्वास्थ्य और निरोगी जीवन के महत्व का भी संदेश देता है।
Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है loksatya इसकी पुष्टि नहीं करता है।