शिवसेना (यूबीटी) की दिग्गज नेता प्रियंका चतुर्वेदी ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान पर तीखा हमला बोलते हुए उनके इस्तीफे की मांग की। उन्होंने कहा कि नीट समेत विभिन्न परीक्षाओं में लगातार हुई कथित गड़बड़ियों और छात्रों के आंदोलन को संभालने में सरकार विफल रही है। सरकार छात्रों की आवाज सुनने के बजाय दमन का रास्ता अपना रही है और लोकतांत्रिक विरोध-प्रदर्शनों को दबाने का प्रयास कर रही है।
शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही चाहते हैं
प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा कि धर्मेंद्र प्रधान को लंबे-लंबे एक्स पोस्ट लिखने के बजाय अपनी नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए इस्तीफा दे देना चाहिए। छात्रों की मांग पूरी तरह स्पष्ट है और वे किसी राजनीतिक एजेंडे के तहत प्रदर्शन नहीं कर रहे हैं। छात्र न तो राजनीति कर रहे हैं और न ही कोई अनुचित मांग रख रहे हैं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही चाहते हैं।
विफलताओं का दोष दूसरों पर मढ़ने की कोशिश
उन्होंने कहा कि यदि शिक्षा मंत्री अपने सोशल मीडिया पोस्ट के नीचे आए हजारों लोगों के कमेंट पढ़ लें, तो उन्हें यह समझ में आ जाएगा कि देश का जनमत क्या है। सरकार अपनी विफलताओं का दोष दूसरों पर मढ़ने की कोशिश कर रही है। छात्रों को सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर करने की जिम्मेदारी स्वयं सरकार की है।
अपनी नैतिक जिम्मेदारी निभा रहे
प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा कि देश का युवा आज पहले से कहीं अधिक जागरूक है और इसी कारण वह अपने अधिकारों के लिए सड़क पर उतरने को मजबूर हुआ है। केंद्र सरकार अहंकार से भरी हुई है और उसे तब तक कोई निर्णय लेना मंजूर नहीं होता, जब तक जनता आंदोलन न करे। सत्ता में बैठे लोगों को अपनी अंतरात्मा से सवाल करना चाहिए कि क्या वे अपनी नैतिक जिम्मेदारी निभा रहे हैं। नीट परीक्षा से जुड़ी अव्यवस्थाओं के कारण 22 से अधिक छात्रों ने आत्महत्या की और उनके परिजन आज जंतर-मंतर पर न्याय की मांग को लेकर बैठे हैं। विभिन्न आयु वर्ग के छात्रों और उनके परिवारों का दुख सरकार को समझना चाहिए, लेकिन इसके बजाय मंत्री सोशल मीडिया पर लंबी-लंबी बातें कर रहे हैं।
हिरासत में लिए जाने जैसी घटनाएं बेहद दुखद
शिवसेना (यूबीटी) नेता ने आरोप लगाया कि सरकार लोकतंत्र और संविधान की भावना को कमजोर कर रही है। संसद में लगातार इस मुद्दे पर चर्चा कराने की मांग की गई, लेकिन सरकार चर्चा से बचती रही। छात्रों पर लाठीचार्ज, आंसू गैस के गोले दागे जाने और बड़ी संख्या में छात्रों को हिरासत में लिए जाने जैसी घटनाएं बेहद दुखद हैं। देश के इतिहास में अपने ही युवाओं के साथ इस प्रकार का व्यवहार बहुत कम देखने को मिला है।