अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने बयानों को लेकर अक्सर सुर्खियों में रहते हैं। कब क्या कह दें और कब पलट जाएं, यह समझना मुश्किल होता है। हाल ही में उन्होंने ग्रीनलैंड को लेकर ऐसा बयान दिया कि अमेरिका और यूरोप के बीच तनाव बढ़ गया। ट्रंप ने संकेत दिए थे कि अमेरिका ग्रीनलैंड पर दावा कर सकता है और जो देश इसका विरोध करेगा, उस पर टैरिफ लगाया जाएगा। इस बयान से यूरोपीय देशों में हलचल मच गई और अमेरिका-यूरोप टकराव की स्थिति बनने लगी।
ग्रीनलैंड विवाद से बढ़ा तनाव
ग्रीनलैंड भले ही छोटा इलाका लगे, लेकिन रणनीतिक तौर पर यह बेहद अहम है। ट्रंप के ग्रीनलैंड पर कब्जे वाले बयान को यूरोपीय देशों ने गंभीरता से लिया। यूरोप को लगा कि यह सिर्फ बयान नहीं, बल्कि दबाव बनाने की कोशिश है। इसके जवाब में यूरोपीय संघ ने भी अमेरिका के खिलाफ संभावित कदमों पर चर्चा शुरू कर दी। हालात ऐसे बन गए कि दोनों पक्षों के बीच व्यापार युद्ध की आशंका बढ़ने लगी।
दावोस में दिखा ट्रंप का यू-टर्न
तनाव के माहौल के बीच दावोस सम्मेलन में ट्रंप का लहजा अचानक बदल गया। उन्होंने साफ कहा कि ग्रीनलैंड हासिल करने के लिए अमेरिका किसी तरह का बल प्रयोग नहीं करेगा। इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी कहा कि यूरोपीय देशों पर 10 प्रतिशत टैरिफ लगाने का उनका कोई इरादा नहीं है। ट्रंप के इस बयान को बड़ा यू-टर्न माना जा रहा है, क्योंकि कुछ दिन पहले तक उनके तेवर काफी सख्त थे।
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क्या है ईयू का ‘ट्रेड बाजूका’
ट्रंप के बदले रुख के पीछे यूरोपीय संघ के एक खास हथियार की चर्चा हो रही है, जिसे ‘ट्रेड बाजूका’ कहा जाता है। इसका असली नाम एंटी-कोअरशन इंस्ट्रूमेंट है। यह ऐसा कानून है, जिसके तहत ईयू उन देशों के खिलाफ सख्त व्यापारिक कदम उठा सकता है जो उसके सदस्य देशों पर दबाव बनाते हैं। इसमें आयात-निर्यात सीमित करना, कंपनियों को सरकारी टेंडर से बाहर करना और निवेश पर रोक जैसे कदम शामिल हैं।
अमेरिका पर कितना भारी पड़ सकता था यह हथियार
अगर ईयू इस ट्रेड बाजूका का इस्तेमाल करता, तो अमेरिका को बड़ा नुकसान हो सकता था। यूरोपीय संघ का बाजार करीब 45 करोड़ लोगों का है। इस बाजार से बाहर होना अमेरिकी कंपनियों के लिए अरबों डॉलर के नुकसान जैसा होता। यही वजह है कि ट्रेड बाजूका को ईयू का सबसे मजबूत आर्थिक हथियार माना जाता है। जानकारों का मानना है कि इसी डर ने ट्रंप को पीछे हटने पर मजबूर किया।
डर दिखाना ही असली मकसद
यूरोपीय आयोग ने यह कानून साल 2021 में बनाया था, जब चीन ने लिथुआनिया पर व्यापारिक दबाव डाला था। आयोग का साफ कहना है कि इस हथियार का असली मकसद इस्तेमाल करना नहीं, बल्कि डर पैदा करना है। माना जा रहा है कि ट्रंप के मामले में यही रणनीति काम कर गई। अब सवाल यह है कि क्या यह शांति लंबे समय तक टिकेगी या ट्रंप फिर कोई नया बयान देकर दुनिया को चौंका देंगे।