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Lifestyle Tips : मानव जीवन की शुरुआत गर्भ में ही होती है, और यह सोचकर हैरानी होती है कि एक शिशु अपने जन्म से पहले भी बहुत कुछ सीख रहा होता है. विज्ञान और अनुसंधान ने यह साबित किया है कि गर्भ में पल रहा बच्चा न केवल शारीरिक रूप से विकसित होता है, बल्कि मानसिक और भावनात्मक स्तर पर भी अनेक अनुभवों को ग्रहण करता है. यह सब कुछ तब हो रहा होता है, जब वह इस दुनिया में आया भी नहीं होता.
गर्भस्थ शिशु की सुनने की क्षमता लगभग 5वें महीने से विकसित होने लगती है। माँ की आवाज़, दिल की धड़कन और आसपास के माहौल की आवाज़ें धीरे-धीरे उसके मस्तिष्क में दर्ज होने लगती हैं। शोध बताते हैं कि बच्चा माँ की आवाज़ को अन्य सभी आवाज़ों से अलग पहचानता है और जन्म के बाद भी उसी आवाज़ से अधिक जुड़ाव महसूस करता है। यही नहीं, बच्चा कुछ खास संगीत और धुनों को भी गर्भ में याद रखने लगता है, जिसे वह जन्म के बाद पहचान सकता है.
माँ की भावनाएं भी शिशु को प्रभावित करती हैं। जब माँ खुश होती है, तो उसका शरीर खुशहाली के हार्मोन पैदा करता है, जो गर्भ में पल रहे बच्चे तक भी पहुँचते हैं। इसी तरह जब माँ तनाव या डर में होती है, तो उसका असर भी बच्चे के मानसिक विकास पर पड़ता है। यानी बच्चा जन्म से पहले ही भावनाओं की भाषा को समझना शुरू कर देता है. गर्भ में शिशु स्वाद भी महसूस करता है. माँ जो खाती है, उसके स्वाद के अंश एमनियोटिक फ्लूइड (गर्भ जल) में पहुँचते हैं और बच्चा उन्हें चखता है. इसीलिए वैज्ञानिक मानते हैं कि गर्भ में ही बच्चे की भोजन की पसंद और स्वाद की समझ बनने लगती है.
इसके अलावा, बच्चा हिलना-डुलना, उँगलियाँ चूसना, अंगों को फैलाना और सिकोड़ना जैसे शारीरिक अभ्यास भी करता है. ये सभी क्रियाएं उसे जन्म के बाद की ज़िंदगी के लिए तैयार करती हैं. यह सब बिना किसी बाहरी शिक्षा या दुनिया के संपर्क के होता है. इस तरह देखा जाए तो एक शिशु जन्म से पहले ही दुनिया की ओर पहला कदम रख चुका होता है. वह सुनना, महसूस करना, स्वाद लेना, प्रतिक्रिया देना और भावनाएं समझना जैसे अनमोल अनुभवों से गुजर रहा होता है। ये सभी सीखें उसके जीवन की पहली पाठशाला की तरह होती हैं, जो गर्भ में ही शुरू हो जाती है.