भारत में जब भी कुंभ मेले का नाम आता है, तो सबसे पहले हरिद्वार, प्रयागराज, उज्जैन और नासिक की तस्वीर आंखों के सामने आ जाती है। करोड़ों श्रद्धालुओं की भीड़, पवित्र स्नान और अखाड़ों की शोभायात्रा कुंभ की पहचान मानी जाती है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि दक्षिण भारत के केरल में भी एक ऐसा धार्मिक आयोजन होता है, जिसे उसकी भव्यता और आस्था के कारण ‘केरल कुंभ’ कहा जाता है।
क्या है केरल कुंभ?
केरल कुंभ के नाम से प्रसिद्ध यह आयोजन दरअसल अट्टुकल पोंगाला महोत्सव है। यह पर्व तिरुवनंतपुरम स्थित अट्टुकल भगवती मंदिर में प्रतिवर्ष मनाया जाता है। इस आयोजन में लाखों महिलाएं एक साथ माता भगवती की पूजा करती हैं। श्रद्धालुओं की विशाल संख्या और अनूठी परंपरा के कारण इसे कुंभ मेले के समान दर्जा दिया जाता है।
आस्था का अनोखा स्वरूप
अट्टुकल पोंगाला की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें केवल महिलाएं ही भाग लेती हैं। महिलाएं मंदिर से कई किलोमीटर दूर तक सड़कों, गलियों और घरों के सामने मिट्टी के चूल्हों पर पोंगाला पकाती हैं। चावल, गुड़ और नारियल से बनी इस पवित्र खीर को देवी को अर्पित किया जाता है। यह दृश्य आस्था और एकता का ऐसा उदाहरण पेश करता है, जो कुंभ मेले की विराटता की याद दिलाता है।
क्यों माना जाता है कुंभ के समान?
जिस तरह कुंभ मेले में गंगा स्नान का विशेष धार्मिक महत्व होता है, उसी तरह अट्टुकल पोंगाला में पवित्र अग्नि और प्रसाद का महत्व है। दोनों आयोजनों में जनसैलाब उमड़ता है और प्रशासन को व्यापक इंतजाम करने पड़ते हैं। यही कारण है कि श्रद्धा, भीड़ और परंपरा के आधार पर इसे ‘केरल कुंभ’ कहा जाता है।
नारी शक्ति और विश्व पहचान
यह आयोजन सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि नारी शक्ति का प्रतीक भी है। वर्ष 2009 में इसे गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दुनिया के सबसे बड़े महिला धार्मिक समागम के रूप में दर्ज किया गया। इससे इसकी अंतरराष्ट्रीय पहचान और भी मजबूत हुई।