
कहते हैं कि हर त्योहार की अपना-अपना महत्व होता है. किसी त्योहार से हमें एक-दूसरे से गिले-शिकवे दूर करने की सीख मिलती है, तो किसी त्योहार से हमें दान-पुण्य करने का महत्व पता चलता है. वहीं सनातन धर्म में हर त्योहार का खास धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व बताया गया है. जहां साल भर में कई व्रत और त्योहार होते हैं. इन्हीं में शामिल है दिवाली से एक दिन पहले पड़ने वाली नरक चतुर्दशी. नरक चतुर्दशी को छोटी दिवाली और रूप चौदस के नाम से भी जाना जाता है. ये त्योहार विशेष रूप से मनाया जाता है. यह त्योहार अंधकार पर प्रकाश का प्रतीक की विजय का माना जाता है. यही नहीं ये दिन जीवन और मृत्यु के गहरे रहस्यों को भी याद दिलाता है. इस दिन मृत्यु के देवता यमराज की पूजा होती है.
यमराज की पूजा का महत्व
मृत्यु के देवता यमराज नरक चतुर्दशी के दिन विशेष रूप से पूज्यनीय होते हैं. धार्मिक मान्यता के अनुसार ये माना जाता है कि नरक चतुर्दशी के दिन यमराज की पूजा और उनका स्मरण करने से मृत्यु का भय कम हो जाता है. इसके साथ ही जीवन में दीर्घायु और समृद्धि का वास होता है. नरक चतुर्दशी सिर्फ यम देवता की पूजा करने तक सीमित नहीं है. यह त्योहार जीवन की सुरक्षा, परिवार की रक्षा और मानसिक शांति का भी प्रतीक माना जाता है.
आध्यात्मिक शक्ति की होती है प्राप्ति
इसके साथ ही इस दिन यमराज की पूजा करने से आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त होती है. यही वजह है कि इस दिन यमराज की विशेष रूप से पूजा की जाती है. कहा जाता है कि नरक चतुर्दशी के दिन शाम के समय गेहूं के आटे से एक दीपक बनाना चाहिए. फिर चार छोटी-बड़ी बत्तियां तैयार करके दीपक में रख देनी चाहिए.
घर के बाहर दक्षिण दिशा में जलाएं दीपक
इसके बाद इस दीपक में सरसों का तेल डालकर उसके चारों ओर गंगाजल छिड़कना चाहिए. फिर दीपक को घर के मुख्य द्वार पर दक्षिण दिशा की ओर जलाना चाहिए. वहीं इस दीपक के नीचे थोड़ा अनाज जरूर रखना चाहिए. इस विधि से दीपक जलाने पर घर में अकाल मृत्यु टल जाती है. मां लक्ष्मी की कृपा मिलती है. साथ ही परिवार में खुशहाली आती है.