
शारदीय नवरात्रि में अष्टमी और नवमी तिथि का विशेष महत्व माना जाता है। इन दोनों दिनों पर कन्या पूजन की परंपरा शास्त्रों में बताई गई है। मान्यता है कि इस दिन छोटी बच्चियों के रूप में मां दुर्गा घर-घर आती हैं। उनके स्वागत और सम्मान से मां की विशेष कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सुख-समृद्धि का संचार होता है।
कन्या पूजन की परंपरा का महत्व
शास्त्रों में नवरात्रि के दौरान किए जाने वाले कन्या पूजन की विशेष विधियां बताई गई हैं। ऐसे में आइए जानते हैं कि किन 5 सामग्रियों के बिना कन्या पूजन अधूर रह जाएगा और इसकी सही विधि क्या है। शास्त्रों में देवी दुर्गा के नौ स्वरूप बताए गए हैं- शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंधमाता, कात्यायिनी, कालरात्रि, महागौरी और माता सिद्धिदात्री। इन्हीं स्वरूपों की आराधना के साथ अष्टमी या नवमी के दिन कन्या पूजन का विधान है। कहा जाता है कि विषम संख्या में कन्याओं को आमंत्रित कर पूजन करने से देवी का विशेष आशीर्वाद मिलता है। यह परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है और आज भी समान रूप से महत्व रखती है।
कन्या पूजन की सही विधि
कन्या पूजन के समय घर आई बच्चियों का सम्मानपूर्वक स्वागत करना चाहिए। सबसे पहले उनके चरण धोकर स्वच्छ कपड़े से पोंछे जाते हैं। इसके बाद रोली, अक्षत और फूलों से उनका श्रृंगार किया जाता है। पूजा स्थल पर दीपक, आसन, नारियल और कलश की स्थापना करके वातावरण को पवित्र बनाया जाता है। कन्याओं को चुनरी ओढ़ाना और माथे पर तिलक लगाना शुभ माना जाता है।
कन्या पूजन की क्या है सही विधि
कन्या पूजन के समय घर आई बच्चियों का सम्मानपूर्वक स्वागत करना चाहिए। सबसे पहले उनके चरण धोकर स्वच्छ कपड़े से पोंछे जाते हैं। इसके बाद रोली, अक्षत और फूलों से उनका श्रृंगार किया जाता है। पूजा स्थल पर दीपक, आसन, नारियल और कलश की स्थापना करके वातावरण को पवित्र बनाया जाता है। कन्याओं को चुनरी ओढ़ाना और माथे पर तिलक लगाना शुभ माना जाता है।
5 चीजें कन्या पूजन में ज़रूरी
कन्या पूजन में भोग अर्पित करना अनिवार्य माना गया है। आमतौर पर इसमें आठ चीजें रखी जाती हैं- फल, मिठाई, हलवा, चावल, खिचड़ी, पापड़, दही और नारियल। यह प्रसाद पहले देवी को अर्पित किया जाता है और फिर बच्चियों को प्रेमपूर्वक खिलाया जाता है। पूजन के दौरान कन्याओं के हाथ में कलावा बांधना, माथे पर तिलक लगाना और उन्हें चुनरी ओढ़ाना शुभ माना जाता है। अंत में दक्षिणा देकर और आशीर्वाद लेकर आरती के साथ विधि पूरी होती है।