Dollar Dominance Decline : दुनिया की सबसे ताकतवर मुद्रा माने जाने वाले अमेरिकी डॉलर को लेकर इन दिनों नई बहस छिड़ी हुई है। हाल के महीनों में डॉलर की कीमत में गिरावट, केंद्रीय बैंकों की बदलती रणनीति और वैश्विक राजनीति में बढ़ते तनाव ने सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या डॉलर का दबदबा अब कमजोर पड़ रहा है। जनवरी से अगस्त 2026 के बीच डॉलर इंडेक्स में करीब 10 फीसदी की गिरावट ने इस चर्चा को और तेज कर दिया है।
डॉलर पर दबाव बढ़ने की बड़ी वजहें
विशेषज्ञों के मुताबिक कई कारण एक साथ सामने आए हैं। दुनिया के कई केंद्रीय बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर की हिस्सेदारी घटाने पर विचार कर रहे हैं। दूसरी ओर, रूस जैसे देशों ने ऊर्जा कारोबार में डॉलर का इस्तेमाल कम करना शुरू कर दिया है। अमेरिका का बढ़ता कर्ज और वैश्विक स्तर पर वैकल्पिक मुद्राओं की बढ़ती स्वीकार्यता भी डॉलर पर दबाव बढ़ा रही है।
पेट्रोडॉलर व्यवस्था में आई दरार
दशकों से वैश्विक तेल कारोबार मुख्य रूप से डॉलर में होता रहा है। लेकिन अब कई देश स्थानीय मुद्राओं या अन्य करेंसी में व्यापार की संभावनाएं तलाश रहे हैं। इससे डॉलर की मांग पर असर पड़ सकता है। यही वजह है कि पेट्रोडॉलर व्यवस्था में बदलाव को डॉलर के लिए एक अहम चुनौती माना जा रहा है।
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क्या सचमुच खत्म हो जाएगी डॉलर की बादशाहत?
फिलहाल ऐसा मानना जल्दबाजी होगी। आज भी वैश्विक व्यापार, विदेशी मुद्रा भंडार और अंतरराष्ट्रीय भुगतान प्रणाली में डॉलर की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है। दुनिया के अधिकांश बड़े वित्तीय लेनदेन अब भी डॉलर में ही होते हैं। इसलिए निकट भविष्य में डॉलर का पूरी तरह प्रभाव खत्म होना मुश्किल माना जा रहा है।
भारत को क्या फायदा हो सकता है?
अगर वैश्विक व्यापार में स्थानीय मुद्राओं का इस्तेमाल बढ़ता है तो भारत को बड़ा लाभ मिल सकता है। रुपये में व्यापार बढ़ने से विदेशी मुद्रा पर दबाव कम होगा और आयात-निर्यात प्रक्रिया आसान बन सकती है। इससे भारतीय कंपनियों को डॉलर की कीमतों में उतार-चढ़ाव से भी कुछ राहत मिल सकती है।
भारत के सामने चुनौतियां भी कम नहीं
हालांकि डॉलर की कमजोरी का मतलब सिर्फ फायदा नहीं है। अगर वैश्विक वित्तीय बाजारों में अस्थिरता बढ़ती है तो इसका असर भारत समेत दुनिया की उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर भी पड़ सकता है। इसलिए भारत के लिए सबसे अहम बात यह होगी कि वह रुपये की वैश्विक स्वीकार्यता बढ़ाने के साथ-साथ आर्थिक स्थिरता को भी मजबूत बनाए रखे। फिलहाल डॉलर की बादशाहत पर सवाल जरूर उठ रहे हैं, लेकिन उसकी जगह लेने वाला कोई मजबूत विकल्प अभी पूरी तरह सामने नहीं आया है।