दुनियाभर के केंद्रीय बैंक अब अपने विदेशी मुद्रा भंडार में अमेरिकी डॉलर की हिस्सेदारी घटाने पर विचार कर रहे हैं। एक सर्वे के मुताबिक, आने वाले वर्षों में कई देश अपने रिजर्व को अधिक विविध बनाने की रणनीति अपना सकते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि डॉलर की भूमिका तुरंत खत्म होगी, बल्कि अन्य मुद्राओं और सोने को भी ज्यादा महत्व दिया जाएगा।
क्यों बदल रही है दुनिया की सोच?
अब तक अंतरराष्ट्रीय व्यापार और विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर का दबदबा रहा है। लेकिन हाल के वर्षों में भू-राजनीतिक तनाव, अमेरिकी नीतियों को लेकर बढ़ी अनिश्चितता और कई देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ने से केंद्रीय बैंक विकल्प तलाश रहे हैं। उनका उद्देश्य किसी एक मुद्रा पर अत्यधिक निर्भरता कम करना है।
डॉलर की जगह किन विकल्पों पर नजर?
सर्वे के अनुसार, केंद्रीय बैंक सोने के अलावा यूरो, ब्रिटिश पाउंड, चीनी युआन, नॉर्वे की क्रोन और न्यूजीलैंड डॉलर जैसी मुद्राओं में भी रुचि दिखा रहे हैं। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल इनमें से कोई भी मुद्रा डॉलर का पूर्ण विकल्प नहीं बन सकी है, क्योंकि वैश्विक व्यापार और निवेश में डॉलर की भूमिका अब भी सबसे मजबूत है।
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सोने का बढ़ रहा है महत्व
कई देशों के केंद्रीय बैंक लगातार अपने गोल्ड रिजर्व बढ़ा रहे हैं। वैश्विक अनिश्चितता और भू-राजनीतिक जोखिमों के बीच सोने को सुरक्षित निवेश और विदेशी मुद्रा भंडार में संतुलन बनाए रखने का अहम साधन माना जा रहा है। यही वजह है कि हाल के वर्षों में गोल्ड रिजर्व बढ़ाने की प्रवृत्ति तेज हुई है।
क्या डॉलर का दबदबा खत्म हो जाएगा?
फिलहाल ऐसा नहीं माना जा रहा कि डॉलर जल्द ही अपनी वैश्विक स्थिति खो देगा। अंतरराष्ट्रीय व्यापार, निवेश और विदेशी मुद्रा भंडार में उसकी हिस्सेदारी अभी भी सबसे अधिक है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में वैश्विक वित्तीय व्यवस्था अधिक बहुध्रुवीय हो सकती है, जहां कई मुद्राएं समानांतर भूमिका निभाएंगी।
भारत पर क्या पड़ सकता है असर?
अगर दुनिया धीरे-धीरे डॉलर पर निर्भरता कम करती है, तो भारत को रुपये में अंतरराष्ट्रीय व्यापार बढ़ाने का अवसर मिल सकता है। साथ ही भारत अपने विदेशी मुद्रा भंडार में सोने और अन्य प्रमुख मुद्राओं की हिस्सेदारी भी बढ़ा सकता है। हालांकि यह बदलाव धीरे-धीरे होगा और निकट भविष्य में डॉलर की वैश्विक अहमियत बनी रहने की संभावना है।