दुर्गा पूजा का समापन हमेशा आंसुओं और मुस्कानों के संगम से भरा होता है। विजयादशमी के अवसर पर माँ दुर्गा की विदाई बेटी की तरह होती है। इसी भावुक परंपरा के तहत बंगाली समाज की महिलाओं ने 'सिंदूर खेला' की रस्म निभाई, जिसमें सुहाग की लंबी उम्र और परिवार के सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। लाल सिंदूर का यह खेल आंसुओं को रंगीन बना देता है और संस्कृति के संरक्षण का संदेश भी देता है।
'सिंदूर खेला' की अनूठी रस्म
विजयादशमी के दिन बंगाली महिलाएँ पारंपरिक लाल बॉर्डर वाली सफेद साड़ियों में सजी-धजी माँ दुर्गा के चेहरे पर सिंदूर अर्पित करती हैं। इसके बाद वे एक-दूसरे के माथे, गालों और कंधों पर सिंदूर मलती हैं। यह दृश्य मानो सिंदूर की होली हो, जिसमें हंसी-ठिठोली और भावनाएँ साथ चलती हैं। परंपरा के अंत में आँखें नम हो जाती हैं, क्योंकि यह क्षण विदाई का होता है। माना जाता है कि माँ दुर्गा हर साल मायके आती हैं और दशहरे पर लौट जाती हैं।
धुनुची नृत्य और भक्ति का उल्लास
विदाई से पहले महिलाओं ने माँ दुर्गा को पान और मिठाई का भोग लगाया। ढोल-नगाड़ों की थाप पर धुनुची नृत्य हुआ, जिसमें जलती हुई धुनची की लपटों में भक्ति झलकती रही। यह दृश्य श्रद्धा और उत्साह दोनों का संगम था। पंडालों में इस साल 'रंग-रस-रीति' थीम पर साज-सज्जा की गई थी, जिसने माहौल को और भी आकर्षक बना दिया।
विदाई का सांस्कृतिक महत्व
सिंदूर खेला सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि सुहागिनों के लिए आशीर्वाद और समाज के लिए एकता का प्रतीक है। यह परंपरा भावनाओं से भरी हुई है, जो नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ती है। माँ दुर्गा की विदाई हमें सिखाती है कि अलगाव दुखी नहीं, बल्कि अगले आगमन की उम्मीद है। यह भावुक क्षण हर किसी के हृदय को छू जाता है और अमिट यादें छोड़ जाता है।