भारत के चीफ जस्टिस बी.आर. गवई के करीब छह महीने के कार्यकाल के दौरान देश की न्यायपालिका में विविधता बढ़ाने पर खास जोर दिखाई दिया। इस अवधि में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने कुल 129 नामों की सिफारिश सरकार को भेजी, जिनमें से 93 को मंजूरी मिली। इन नियुक्तियों में अनुसूचित जाति से 10 और ओबीसी व अन्य पिछड़ा वर्ग से 11 न्यायाधीश शामिल रहे। गवई देश के पहले बौद्ध और दूसरे दलित सीजेआई हैं, और उनके नेतृत्व में न्यायपालिका में सामाजिक प्रतिनिधित्व के विस्तार पर स्पष्ट रूप से काम हुआ। इसी दौरान सुप्रीम कोर्ट में भी पांच नए जजों—जस्टिस एनवी अंजारिया, विजय बिश्नोई, एएस चंदुरकर, आलोक अराधे और विपुल पंचोली—की नियुक्ति हुई।
अल्पसंख्यक और महिला न्यायाधीशों की बढ़ी उपस्थिति
सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर दर्ज आधिकारिक विवरण बताता है कि 14 मई के बाद से नियुक्ति के लिए जिन 93 नामों को मंजूरी मिली, उनमें अल्पसंख्यक समुदायों से 13 और 15 महिला न्यायाधीश शामिल थीं। यह दर्शाता है कि CJI गवई के नेतृत्व में न्यायपालिका में व्यापक प्रतिनिधित्व पर ध्यान दिया गया। इसके अलावा, नियुक्त किए गए न्यायाधीशों में 49 बार से और बाकी सेवा संवर्ग से आए, जबकि पांच न्यायाधीश उन परिवारों से संबंधित थे जिनके सदस्य पहले न्यायपालिका में रह चुके हैं।
कार्यकाल के अहम फैसले और विरासत
CJI गवई का कार्यकाल 23 नवंबर को समाप्त हो गया, जिसके बाद 24 नवंबर को जस्टिस सूर्यकांत नए चीफ जस्टिस के रूप में शपथ लेंगे। अपने छह महीने के कार्यकाल में गवई ने कई प्रमुख फैसले दिए, जिनमें वक्फ कानून के महत्वपूर्ण प्रावधानों पर रोक, न्यायाधिकरण सुधार कानून को निरस्त करना और केंद्र सरकार को परियोजनाओं को बाद में पर्यावरणीय मंजूरी देने की अनुमति जैसे निर्णय शामिल रहे। अंतिम कार्य दिवस पर उन्होंने कहा कि चार दशक की यात्रा पूरी करने के बाद वह न्याय के विद्यार्थी के रूप में संस्था को संतोष के साथ छोड़ रहे हैं।