खंडवा। दशहरा पर्व पूरे देश में रावण दहन की परंपरा के साथ मनाया जाता है, लेकिन मध्य प्रदेश का धार्मिक स्थल ओंकारेश्वर अपनी अलग परंपरा के लिए जाना जाता है। यहां विजयादशमी का पर्व भव्य और धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ तो मनता है, लेकिन खास बात यह है कि यहां रावण दहन नहीं किया जाता। मान्यता है कि चूंकि रावण भगवान शिव का परम भक्त था, इसलिए ओंकारेश्वर से 10 किलोमीटर के दायरे में स्थित किसी भी गांव में कभी भी रावण का पुतला नहीं जलाया जाता।
प्राचीन परंपरा और विवाद की याद
स्थानीय किवदंतियों के अनुसार, यह परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। साल 2013 में समीपवर्ती शिवकोठी गांव में युवाओं ने रावण दहन की कोशिश की थी, जिसके बाद गांव में बड़ा विवाद खड़ा हो गया। महिलाएं आपस में बोलचाल बंद कर बैठीं और पुरुषों ने भी मेल-मिलाप छोड़ दिया। अंततः गांव के बुजुर्गों ने समझौता कराया और यह संकल्प लिया कि भविष्य में यहां कभी रावण दहन नहीं होगा।
क्यों नहीं होता रावण दहन?
ओंकारेश्वर के लोगों का मानना है कि रावण भगवान शिव का अनन्य भक्त था, जिसने अपनी भक्ति सिद्ध करने के लिए अपने ही सिर भगवान को अर्पित किए थे। इसी कारण यहां पुतला दहन की परंपरा नहीं है। स्थानीय पुजारियों का कहना है कि धार्मिक मान्यता के साथ-साथ रावण दहन पर होने वाला भारी खर्च भी इसका एक कारण है। नगर के विद्वानों का मानना है कि दशहरे का असली संदेश अपने भीतर की बुराइयों को खत्म करना है, न कि सिर्फ बाहरी पुतला जलाना।
कैसे मनाया जाता है दशहरा
ओंकारेश्वर में विजयादशमी की शाम भगवान ओंकारेश्वर की भव्य सवारी मंदिर से निकलती है। सवारी नगर के मुख्य बाजार और खेड़ापति हनुमान मंदिर तक जाती है, जहां शमी वृक्ष की पूजा होती है। इसके बाद भगवान की सवारी मंदिर लौट आती है। साथ ही राजमहल में दशहरा मिलन समारोह आयोजित होता है, जहां राजा राव पुष्पेंद्रसिंह को गद्दी पर बैठाया जाता है। लोग उन्हें शुभकामनाएं देते हैं और बदले में राजा अपनी प्रजा को श्रीफल और प्रसाद देकर आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
बुराइयों के दहन का संदेश
यहां दशहरा का मूल संदेश है—अपने भीतर की बुराइयों को खत्म करना। ओंकारेश्वर की यह परंपरा बताती है कि त्योहार का महत्व केवल पुतला जलाने में नहीं, बल्कि उससे जुड़ी सीख को जीवन में उतारने में है। यही कारण है कि आज भी इस धार्मिक नगरी और आसपास के गांवों में रावण दहन नहीं होता, बल्कि यह पर्व भाईचारे, सौहार्द और आत्मशुद्धि का संदेश लेकर आता है।