Ravan Dahan:शारदीय नवरात्रि के दौरान देश के अलग-अलग शहरों में रामलीला का मंचन किया जाता है। नौ दिनों तक चलने वाले इस धार्मिक आयोजन का समापन दशहरे के उत्सव के साथ होता है। विजयादशमी के दिन रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के विशाल पुतले जलाए जाते हैं। इस परंपरा को बुराई के अंत और अच्छाई की जीत के रूप में देखा जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि दशहरे पर रावण का पुतला जलाने की शुरुआत कब हुई और यह आयोजन इतना लोकप्रिय कैसे बना? आइए, रावण दहन के इतिहास और रामलीला की परंपरा के बारे में जानते हैं।
क्यों मनाया जाता है दशहरा और रावण दहन का क्या है महत्व?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, त्रेतायुग में भगवान श्रीराम ने लंका के राजा रावण का वध करके माता सीता को उसकी कैद से मुक्त कराया था। यह घटना आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि से जुड़ी मानी जाती है। इसी कारण इस दिन को विजयादशमी या दशहरा कहा जाता है। दशहरे पर रावण का पुतला जलाना इसी विजय की याद दिलाता है। इस पर्व के जरिए लोगों को संदेश दिया जाता है कि अहंकार, अन्याय और अधर्म चाहे कितने भी शक्तिशाली क्यों न हों, अंत में सत्य और धर्म की ही जीत होती है। वर्ष 2026 में दशहरा 20 अक्टूबर को मनाया जाएगा। इस अवसर पर देश के कई हिस्सों में रामलीला के समापन के बाद रावण दहन के कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
कब और कहां से शुरू हुई रावण दहन की परंपरा?
रावण दहन की परंपरा को लेकर अलग-अलग क्षेत्रों में कई ऐतिहासिक विवरण मिलते हैं। झारखंड की राजधानी रांची में आयोजित होने वाला रावण दहन भी अपने इतिहास के लिए जाना जाता है। प्रचलित जानकारी के अनुसार, रांची में रावण दहन का आयोजन वर्ष 1948 में शुरू हुआ था। बताया जाता है कि भारत के विभाजन के बाद पाकिस्तान से विस्थापित होकर आए लोगों ने रांची में दशहरे का आयोजन किया और रावण का पुतला जलाया। धीरे-धीरे यह आयोजन स्थानीय स्तर पर लोकप्रिय हुआ और विजयादशमी के उत्सव का हिस्सा बन गया। हालांकि, रावण दहन की शुरुआत पूरे भारत में सबसे पहले कब हुई, इसका एक निश्चित ऐतिहासिक प्रमाण आसानी से उपलब्ध नहीं है। अलग-अलग क्षेत्रों में इस परंपरा का विकास अलग-अलग समय पर हुआ।
रामलीला का मंचन कब से होने लगा?
दशहरे के उत्सव में रामलीला की भूमिका बेहद अहम है। रामलीला के माध्यम से भगवान श्रीराम के जीवन, वनवास, माता सीता के हरण, हनुमान जी की भक्ति और लंका विजय की कथा को नाटकीय रूप में प्रस्तुत किया जाता है। उत्तर भारत में रामलीला के प्रसार का संबंध गोस्वामी तुलसीदास की रामकथा परंपरा से जोड़ा जाता है। 16वीं शताब्दी के आसपास रामचरितमानस की रचना के बाद रामकथा का जनसामान्य में प्रसार बढ़ा। समय के साथ धार्मिक कथाओं को मंच पर प्रस्तुत करने की परंपरा भी मजबूत हुई। रामलीला का स्वरूप अलग-अलग स्थानों पर अलग हो सकता है। कहीं इसका आयोजन कई दिनों तक चलता है, तो कहीं दशहरे के दिन राम और रावण के युद्ध का विशेष मंचन किया जाता है। इसके बाद रावण दहन के साथ कार्यक्रम संपन्न होता है।
पहले कैसे बनाए जाते थे रावण के पुतले?
आजकल दशहरे पर रावण के पुतले तैयार करने के लिए बांस, कागज, कपड़े और अन्य हल्की सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है। कई जगहों पर पुतलों को रंग-बिरंगे कपड़ों और सजावटी सामान से आकर्षक रूप दिया जाता है। कुछ आयोजनों में पटाखों का भी इस्तेमाल होता है, हालांकि इसके लिए सुरक्षा नियमों का पालन जरूरी है।
पुराने समय में पुतले बनाने की सामग्री और उनका आकार स्थानीय संसाधनों पर निर्भर करता था। समय के साथ कारीगरों ने पुतलों को अधिक ऊंचा और भव्य बनाना शुरू किया। आज कई शहरों में विशालकाय रावण तैयार किए जाते हैं, जिन्हें देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं।
रावण के साथ मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतले क्यों जलाए जाते हैं?
दशहरे के अवसर पर कई जगह रावण के साथ उसके पुत्र मेघनाद और भाई कुंभकर्ण के पुतलों का भी दहन किया जाता है। रामायण की कथा में दोनों का संबंध लंका की ओर से हुए युद्ध से है। मेघनाद को रावण का शक्तिशाली पुत्र और कुंभकर्ण को उसका पराक्रमी भाई बताया गया है। इन तीनों के पुतलों का दहन राम-रावण युद्ध और भगवान श्रीराम की विजय की कथा को दर्शाता है। यह आयोजन लोगों को संदेश देता है कि गलत रास्ते पर चलने और अहंकार में डूबे रहने का परिणाम अंततः विनाश हो सकता है।
इस दशहरे पर कहां देख सकते हैं रावण दहन?
विजयादशमी के दिन देश के अनेक शहरों और कस्बों में रामलीला मैदानों, खुले पार्कों और बड़े सार्वजनिक स्थलों पर रावण दहन के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। कई स्थानों पर पहले रामलीला का अंतिम मंचन होता है और फिर रावण, मेघनाद तथा कुंभकर्ण के पुतले जलाए जाते हैं।
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यदि आप भी इस आयोजन को देखना चाहते हैं, तो अपने शहर के रामलीला मैदान या स्थानीय आयोजकों से कार्यक्रम की तारीख, समय और प्रवेश संबंधी जानकारी पहले प्राप्त कर लें।
Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है loksatya इसकी पुष्टि नहीं करता है।