विजयादशमी का पर्व केवल रावण दहन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें कई प्राचीन परंपराएं और सांस्कृतिक रस्में भी शामिल हैं। दशहरे पर पान खिलाने और सोना पत्ती देने की परंपरा वर्षों से चली आ रही है, जिसका धार्मिक और सामाजिक महत्व माना जाता है। यह परंपराएं रिश्तों में मिठास घोलने, समृद्धि और सौभाग्य लाने वाली मानी जाती हैं। भारत के विभिन्न राज्यों में दशहरे पर ये रस्में अलग-अलग ढंग से निभाई जाती हैं।
पान खिलाने की परंपरा और महत्व
दशहरे पर घर आए मेहमानों और प्रियजनों को पान खिलाने की परंपरा उत्तर भारत, गुजरात और महाराष्ट्र में विशेष रूप से देखी जाती है। पंडितों के अनुसार पान को देवी-देवताओं का प्रिय माना जाता है। इसे प्रसाद के रूप में बांटने से घर में सुख-समृद्धि आती है। पान आपसी रिश्तों में मधुरता का प्रतीक है और सौभाग्य का वाहक भी। इसलिए दशहरे पर पान खिलाना केवल आतिथ्य नहीं बल्कि आशीर्वाद देने की परंपरा है।
सोना पत्ती देने की परंपरा
दशहरे पर एक-दूसरे को “सोना पत्ती” देने का भी विशेष महत्व है। सोना धन-धान्य और देवी लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है। इस दिन सोना पत्ती का आदान-प्रदान करने से आर्थिक उन्नति के द्वार खुलते हैं। महाराष्ट्र और गुजरात में यह परंपरा व्यापक रूप से प्रचलित है, जहां लोग सोने जैसे पत्ते या छोटे टुकड़े उपहार स्वरूप देते हैं। इसे समृद्धि और भविष्य में उन्नति का संदेश माना जाता है।
शमी वृक्ष की पूजा और स्वर्णपत्र
दशहरे की एक और अहम परंपरा है शमी वृक्ष की पूजा। मान्यता है कि पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान अपने हथियार शमी वृक्ष में छिपाए थे और विजयादशमी पर उन्हें पुनः प्राप्त कर युद्ध में विजय पाई थी। तभी से शमी वृक्ष पूजनीय माना जाता है। इसके पत्तों को एक-दूसरे को भेंट करने की परंपरा ‘स्वर्णपत्र’ के नाम से जानी जाती है, जो रिश्तों में मजबूती और सौभाग्य का प्रतीक है।