भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) देश की सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी यानी ई-रुपये को आम लोगों तक पहुंचाने की दिशा में तेजी से काम कर रहा है। अब केंद्रीय बैंक वेलफेयर पेमेंट्स और बॉर्डर-पार ट्रांजैक्शन में डिजिटल रुपये के इस्तेमाल को बढ़ाने की संभावनाओं पर विचार कर रहा है। यदि यह योजना सफल होती है तो ई-रुपये की पहुंच केवल भारत तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इसकी पहचान मजबूत हो सकती है।
वेलफेयर योजनाओं में मिला सकारात्मक अनुभव
RBI की 2025-26 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष के दौरान गुजरात, पुडुचेरी और चंडीगढ़ सहित कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में CBDC आधारित वेलफेयर पायलट प्रोग्राम चलाए गए। इन योजनाओं के तहत लाभार्थियों को फूड सब्सिडी जैसी सहायता सीधे ई-रुपये के माध्यम से प्रदान की गई। शुरुआती परिणामों ने संकेत दिया है कि डिजिटल करेंसी के जरिए सरकारी सहायता को अधिक पारदर्शी और प्रभावी तरीके से वितरित किया जा सकता है।
DBT में प्रोग्रामेबल CBDC का बढ़ता उपयोग
रिपोर्ट में बताया गया है कि कई सरकारी एजेंसियों ने विभिन्न डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) योजनाओं में CBDC के पायलट प्रोजेक्ट शुरू किए हैं। इन परियोजनाओं में डिजिटल रुपये की प्रोग्रामेबल विशेषताओं का उपयोग किया जा रहा है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सरकारी धन निर्धारित उद्देश्य के लिए ही इस्तेमाल हो और सार्वजनिक संसाधनों का अधिक प्रभावी प्रबंधन किया जा सके। विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक भविष्य में सरकारी भुगतान प्रणाली को पूरी तरह बदल सकती है।
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सीमा पार भुगतान में भी खुल सकते हैं नए रास्ते
RBI अब डिजिटल रुपये के जरिए अंतरराष्ट्रीय भुगतान व्यवस्था को भी अधिक सरल और तेज बनाने की दिशा में संभावनाएं तलाश रहा है। यदि ई-रुपया सीमा पार लेनदेन में सफल साबित होता है, तो विदेशी भुगतान की प्रक्रिया कम खर्चीली और अधिक सुरक्षित बन सकती है। इससे भारत की डिजिटल वित्तीय प्रणाली को वैश्विक स्तर पर नई पहचान मिलने की उम्मीद है।
प्लास्टिक नोटों पर भी RBI की नजर
डिजिटल करेंसी के विस्तार के साथ-साथ RBI देश में पॉलिमर यानी प्लास्टिक नोट लाने की संभावना पर भी विचार कर रहा है। कागज के नोटों की बढ़ती छपाई लागत, उनकी सीमित उम्र और नकदी की बढ़ती मांग को देखते हुए यह कदम महत्वपूर्ण माना जा रहा है। दुनिया के करीब 60 देशों में पहले से ही पॉलिमर नोटों का उपयोग हो रहा है। ऑस्ट्रेलिया ने 1988 में इसकी शुरुआत की थी, जिसके बाद सिंगापुर, मलेशिया, इंडोनेशिया और थाईलैंड जैसे देशों ने भी इसे अपनाया। अब भारत भी इस दिशा में बड़ा कदम बढ़ाने की तैयारी करता दिखाई दे रहा है।