आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर संतुलित लेकिन भरोसेमंद तस्वीर पेश की गई है। अमेरिकी टैरिफ, वैश्विक अनिश्चितता और कमजोर रुपये के बावजूद विकास की रफ्तार बनाए रखने पर जोर दिया गया है। साथ ही अमेरिका के साथ प्रस्तावित व्यापार समझौते पर 2026 में सहमति बनने की संभावना जताते हुए निर्यात, इंफ्रास्ट्रक्चर और नई तकनीक को भविष्य की रीढ़ बताया गया है।
अमेरिका से ट्रेड डील पर क्या कहता है सर्वे
आर्थिक सर्वे में भारत-अमेरिका व्यापार समझौते का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि दोनों देशों के बीच बातचीत जारी है और साल 2026 में इस पर अंतिम मुहर लग सकती है। रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी टैरिफ के दौर में भी भारत की निर्यात और मैन्युफैक्चरिंग गतिविधियों पर सीमित असर पड़ा है। सरकार द्वारा टैरिफ के प्रभाव को कम करने के लिए उठाए गए कदमों ने आर्थिक गति को सहारा दिया है, जिससे समग्र विकास दर स्थिर बनी रही।
GDP ग्रोथ के पीछे घरेलू मांग की ताकत
सर्वे के मुताबिक वित्त वर्ष 2025-26 के शुरुआती अनुमान में GDP वृद्धि दर 7.4 प्रतिशत आंकी गई है। इसका बड़ा कारण घरेलू मांग का मजबूत रहना है। ग्रामीण और शहरी इलाकों में खपत संतुलित बनी हुई है, जबकि इंफ्रास्ट्रक्चर में निरंतर निवेश से रोजगार और आय के अवसर पैदा हो रहे हैं। सड़क, रेलवे, लॉजिस्टिक्स और डिजिटल ढांचे में बढ़ते खर्च ने आर्थिक गतिविधियों को गति दी है।
राजकोषीय अनुशासन और इंफ्रास्ट्रक्चर का असर
आर्थिक सर्वे में कहा गया है कि फिस्कल अनुशासन में सुधार और पूंजीगत खर्च में वृद्धि से विकास टिकाऊ बन रहा है। अनुमान है कि FY26 में राजकोषीय घाटा GDP के 4.8 प्रतिशत के भीतर रह सकता है। सर्वे के अनुसार, इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार न केवल उत्पादकता बढ़ा रहा है बल्कि निजी निवेश को भी आकर्षित कर रहा है, जिससे दीर्घकालिक विकास की नींव मजबूत हो रही है।
वैश्विक दबावों के बीच भी स्थिरता
रिपोर्ट में माना गया है कि वैश्विक स्तर पर कुछ नकारात्मक जोखिम बने हुए हैं, लेकिन मौजूदा परिस्थितियां भारत के लिए तुरंत किसी बड़े मैक्रो-इकोनॉमिक संकट का संकेत नहीं देतीं। मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार, स्थिर बैंकिंग प्रणाली और नीतिगत विश्वसनीयता को सुरक्षा कवच बताया गया है। इससे वैश्विक उतार-चढ़ाव के दौर में भी अर्थव्यवस्था को संतुलन बनाए रखने में मदद मिल रही है।
निर्यात, AI और राज्यों को सलाह
आर्थिक सर्वे में रुपये को लेकर कहा गया है कि करंट अकाउंट डेफिसिट के चलते इसमें कुछ दबाव है, लेकिन कमजोर मुद्रा से अर्थव्यवस्था को अत्यधिक नुकसान नहीं हो रहा। फिर भी मुद्रा स्थिरता के लिए वैल्यू-एडेड और तकनीक आधारित निर्यात बढ़ाने की जरूरत बताई गई है। पहली बार आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर अलग अध्याय शामिल किया गया है, जिससे संकेत मिलता है कि आने वाले समय में नई तकनीकों पर सरकारी फोकस बढ़ेगा। साथ ही राज्यों को सलाह दी गई है कि वे नकद ट्रांसफर की जगह पूंजीगत खर्च को प्राथमिकता दें, ताकि निजी निवेश पर नकारात्मक असर न पड़े।