महाशिवरात्रि का पर्व हिन्दू धर्म में अत्यंत पावन और शुभ माना गया है। इस दिन शिव भक्त उपवास, रात्रि जागरण और शिवलिंग पर जलाभिषेक कर भगवान शिव की आराधना करते हैं। लेकिन जब महाशिवरात्रि पर भद्रा का साया पड़ता है, तो पूजन और अभिषेक की विधि में विशेष सावधानी बरतनी होती है। क्योंकि शास्त्रों में भद्रा काल को अशुभ बताया गया है और इस समय किए गए शुभ कार्यों का फल मनोनुकूल नहीं मिलता।
क्या होता है भद्रा का साया?
भद्रा पंचांग के करण भाग का एक विशेष समय होता है, जिसे "विष्टि करण" कहा जाता है। यह समय किसी भी शुभ कार्य जैसे विवाह, पूजन, यात्रा या नए कार्य की शुरुआत के लिए वर्जित माना जाता है। यदि भद्रा काल महाशिवरात्रि के दिन हो, तो शिव पूजन और जल अर्पण भी उचित समय पर ही करना चाहिए।
शिवरात्रि पर जल चढ़ाने का सही समय
महाशिवरात्रि की पूजा रात्रि के चार प्रहरों में की जाती है, जिसमें निशीथ काल (रात 12 बजे के आसपास) का महत्व सबसे अधिक होता है। यदि भद्रा दिन के समय में हो, तो रात्रि के समय भद्रा समाप्त होने के बाद शिवलिंग पर जल या पंचामृत अर्पित करना सर्वोत्तम माना गया है।
शुभ मुहूर्त चुनने के सुझाव
यदि भद्रा दिन में है और रात को समाप्त हो रही है, तो पूजा रात में करें।
जलाभिषेक के लिए निशीथ या भद्रा समाप्ति के बाद का समय चुनें।
स्थानीय पंचांग या विश्वसनीय ज्योतिषी से समय की पुष्टि करें।
जानने योग्य बात
महाशिवरात्रि पर यदि भद्रा का योग हो, तो पूजन काल का चयन अत्यंत सोच-समझकर करना चाहिए। सही समय पर श्रद्धा और नियमपूर्वक की गई शिव आराधना से भगवान भोलेनाथ शीघ्र प्रसन्न होते हैं और भक्तों को आशीर्वाद प्रदान करते हैं। अतः इस महापर्व पर पूजन से पहले भद्रा की स्थिति जानना और शुभ मुहूर्त में ही जल चढ़ाना अनिवार्य है।