लखनऊ। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले असदुद्दीन ओवैसी और सांसद चंद्रशेखर आजाद के बीच संभावित गठबंधन को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। दोनों नेताओं के बीच साझा मोर्चा बनाने की बातचीत की खबरें हैं। आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) और एआईएमआईएम के साथ कुछ छोटे दलों को जोड़ने की कोशिश भी चल रही है। हालांकि, अभी तक गठबंधन की औपचारिक घोषणा नहीं हुई है।
छोटे दलों को साथ लाने की कोशिश
संभावित मोर्चे में स्वामी प्रसाद मौर्य की अपनी जनता पार्टी और पल्लवी पटेल के नेतृत्व वाले अपना दल (कमेरावादी) के शामिल होने की चर्चा है। सितंबर में भी इन नेताओं को साथ लाकर साझा मंच बनाने की संभावनाओं की खबरें आई थीं। लेकिन बातचीत और गठबंधन की औपचारिक सहमति में अंतर है। इसलिए इन दलों को अभी संभावित सहयोगी के तौर पर ही देखा जा रहा है।
सपा-कांग्रेस के सामने अलग राजनीतिक चुनौती
इस संभावित गठजोड़ का राजनीतिक आधार दलित, मुस्लिम और पिछड़े वर्गों के मतदाताओं को साझा मंच पर लाना हो सकता है। चंद्रशेखर आजाद दलित राजनीति में अपनी स्वतंत्र पहचान मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि ओवैसी मुस्लिम राजनीतिक प्रतिनिधित्व का मुद्दा उठाते रहे हैं। स्वामी प्रसाद मौर्य और पल्लवी पटेल को जोड़ने की कोशिश इस सामाजिक आधार का विस्तार कर सकती है।
ओवैसी पहले भी उत्तर प्रदेश में छोटे दलों के साथ चुनावी मोर्चे बना चुके हैं, लेकिन उन्हें विधानसभा में सीटों के रूप में सफलता नहीं मिली। दूसरी ओर, सपा-कांग्रेस गठबंधन के रहते विपक्षी मतों के बंटवारे का सवाल भी अहम रहेगा।
सीटों का बंटवारा और साझा रणनीति होगी निर्णायक
तीसरे मोर्चे की संभावनाएं केवल नेताओं की मुलाकातों से तय नहीं होंगी। सीटों के बंटवारे, क्षेत्रवार प्रभाव, साझा चुनावी मुद्दों और संगठन की ताकत पर सहमति जरूरी होगी। यदि मोर्चा बनता है, तो उसका असर केवल चुनाव लड़ने वाली सीटों तक सीमित नहीं रहेगा; वह विपक्षी दलों के बीच मतों के बंटवारे और गठबंधन की रणनीति को भी प्रभावित कर सकता है। फिलहाल, औपचारिक घोषणा और सहयोगी दलों की पुष्टि का इंतजार है।