Eid al-Adha 2026: ईद अल-अधा को कुर्बानी और भाईचारे का पर्व माना जाता है, लेकिन उत्तर प्रदेश का एक गांव ऐसा भी है जहां पिछले 19 वर्षों से कुर्बानी नहीं हुई है। यह मामला सिर्फ धार्मिक परंपरा का नहीं, बल्कि सामाजिक सौहार्द और प्रशासनिक सतर्कता से भी जुड़ा हुआ है। हर साल बकरीद के मौके पर यहां पुलिस और प्रशासन पूरी तरह अलर्ट मोड में नजर आते हैं। गांव में आने वाले बकरों तक पर खास निगरानी रखी जाती है ताकि किसी तरह का विवाद पैदा न हो।
गांव में क्यों रुकी कुर्बानी की परंपरा?
स्थानीय लोगों के मुताबिक करीब दो दशक पहले गांव में कुर्बानी को लेकर तनाव की स्थिति बनी थी। इसके बाद प्रशासन और ग्रामीणों के बीच कई दौर की बातचीत हुई। आपसी सहमति और शांति बनाए रखने के उद्देश्य से गांव में सार्वजनिक रूप से कुर्बानी न करने का फैसला लिया गया। तब से लेकर आज तक यह परंपरा लगातार जारी है और गांव में बकरीद शांतिपूर्ण तरीके से मनाई जाती है।
पुलिस की निगरानी में रहते हैं बकरे
ईद से पहले गांव और आसपास के इलाकों में पुलिस की सक्रियता काफी बढ़ जाती है। प्रशासन यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी व्यक्ति नियमों का उल्लंघन न करे। कई बार गांव में लाए जाने वाले बकरों पर भी नजर रखी जाती है ताकि माहौल खराब करने की कोशिश न हो। पुलिस लगातार गश्त करती है और संवेदनशील इलाकों में विशेष निगरानी रखी जाती है।
आपसी भाईचारे की मिसाल बना गांव
गांव के लोग बताते हैं कि यहां हिंदू और मुस्लिम समुदाय के बीच वर्षों से सौहार्द बना हुआ है। त्योहारों को मिल-जुलकर मनाने की परंपरा आज भी कायम है। ग्रामीणों का मानना है कि शांति और भाईचारे से बढ़कर कुछ नहीं होता। इसी सोच के चलते गांव में कभी भी तनावपूर्ण स्थिति पैदा नहीं होने दी गई। प्रशासन भी इस पहल को सामाजिक एकता की मिसाल मानता है।
हर साल प्रशासन रहता है अलर्ट
बकरीद के दौरान जिले के अधिकारी लगातार हालात पर नजर बनाए रखते हैं। संवेदनशील इलाकों में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया जाता है और सोशल मीडिया पर भी निगरानी रखी जाती है। प्रशासन लोगों से अफवाहों से बचने और कानून का पालन करने की अपील करता है। यही वजह है कि पिछले कई वर्षों से गांव में शांति और सौहार्द का माहौल बना हुआ है।