देश में बढ़ती गर्मी और कमजोर होते प्री-मानसून संकेतों के बीच अल नीनो का खतरा किसानों के लिए बड़ी चुनौती बनकर उभर रहा है। इस मौसमी बदलाव का सीधा असर बारिश पर पड़ता है, जिससे खरीफ फसलों पर संकट गहराने लगता है। ऐसे हालात में समय रहते सही खेती रणनीति अपनाना बेहद जरूरी है, ताकि कम पानी और ज्यादा तापमान के बावजूद उत्पादन को सुरक्षित रखा जा सके।
किन इलाकों पर ज्यादा असर का खतरा
अल नीनो सक्रिय होने पर देश के मध्य, उत्तर-पश्चिम और दक्षिणी हिस्सों में सामान्य से कम बारिश होने की संभावना बढ़ जाती है। खासतौर पर महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और कर्नाटक जैसे कृषि प्रधान राज्यों में सूखे जैसे हालात बन सकते हैं। इससे खेती की पूरी योजना प्रभावित हो सकती है।
खरीफ फसलों पर सीधा असर
बारिश में देरी और पानी की कमी का सबसे ज्यादा असर खरीफ सीजन की फसलों पर पड़ता है। धान, मक्का, सोयाबीन और गन्ने जैसी फसलों की शुरुआती बढ़वार कमजोर हो जाती है। लगातार गर्मी और तेज धूप से मिट्टी की नमी खत्म हो जाती है, जिससे पैदावार में गिरावट का खतरा बढ़ जाता है।
स्मार्ट वॉटर मैनेजमेंट ही समाधान
इस संकट से बचने के लिए किसानों को आधुनिक सिंचाई तकनीकों को अपनाना होगा। ड्रिप इरिगेशन और स्प्रिंकलर सिस्टम पानी की बचत के साथ फसलों को जरूरी नमी प्रदान करते हैं। इसके अलावा मल्चिंग तकनीक से मिट्टी में नमी लंबे समय तक बनी रहती है। खेतों में छोटे तालाब या वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम भी उपयोगी साबित हो सकते हैं।
कैसे चुनें सही बीज
अल नीनो के प्रभाव को कम करने के लिए सूखा सहन करने वाली और कम अवधि में तैयार होने वाली बीज किस्मों का चयन करना जरूरी है। वैज्ञानिकों द्वारा विकसित ये उन्नत बीज कम पानी में भी अच्छी उपज देने में सक्षम होते हैं, जिससे जोखिम कम हो जाता है।
इन फसलों को दें प्राथमिकता
इस मौसम में धान की बजाय मोटे अनाज जैसे बाजरा, ज्वार और रागी बेहतर विकल्प माने जाते हैं। साथ ही दलहनी फसलें जैसे मूंग और उड़द भी कम पानी में अच्छी पैदावार देती हैं। बदलते मौसम के अनुसार फसल चयन करना ही इस समय किसानों के लिए सबसे बड़ी समझदारी साबित हो सकता है।