उत्तर प्रदेश में बिजली वितरण व्यवस्था को निजी हाथों में सौंपने की तैयारी शुरू होते ही राज्य में हलचल तेज हो गई है. राज्य विद्युत नियामक आयोग ने पूर्वांचल और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम (Discoms) के निजीकरण प्रस्ताव की समीक्षा शुरू कर दी है. इसके साथ ही इस कदम के विरोध में बिजली कर्मचारी संगठनों सहित कई वर्गों ने एकजुट होकर मोर्चा खोल दिया है.
‘बिजली महापंचायत’ से बिगुल
राजधानी लखनऊ के डॉ. राम मनोहर लोहिया लॉ कॉलेज में रविवार को ‘बिजली महापंचायत’ आयोजित की गई. विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति की अगुवाई में हुई इस बैठक में कर्मचारियों, किसान संगठनों, रेलवे यूनियन और उपभोक्ताओं ने हिस्सा लिया. तय हुआ कि अगर सरकार ने प्रस्ताव नहीं वापस लिया, तो प्रदेशभर में जनांदोलन और जेल भरो आंदोलन छेड़ा जाएगा.
रेलवे से लेकर किसान तक साथ
रेलवे यूनियन नेता शिव गोपाल मिश्रा ने सरकार को चेताया कि यदि निजीकरण थोपने की कोशिश हुई तो रेलवे कर्मचारी भी गिरफ्तारी देंगे. किसान नेता दर्शन पाल और ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के रमानाथ झा ने वर्चुअल समर्थन दिया. राज्यभर के शिक्षक, इंजीनियर और कर्मचारी संगठनों ने भी विरोध में उतरने का एलान किया.
जुलाई में बड़ा आंदोलन, हड़ताल की चेतावनी
महापंचायत में 2 जुलाई को राष्ट्रव्यापी विरोध और 9 जुलाई को एक दिवसीय सांकेतिक हड़ताल की घोषणा की गई. आंदोलन की अगुवाई कर रहे शैलेंद्र दुबे ने कहा कि अगर टेंडर जारी हुआ, तो 27 लाख से अधिक कर्मचारी अनिश्चितकालीन कार्य बहिष्कार करेंगे.
निजीकरण पर फेल मॉडल का हवाला
आगरा, नागपुर, भिवंडी जैसे शहरों में निजीकरण की असफलता का हवाला देते हुए वक्ताओं ने कहा कि निजी कंपनियों ने अरबों का भुगतान नहीं किया. आरोप लगाया गया कि 66 हजार करोड़ रुपये के बकाया पर निजी कंपनियों की नजर है.
दरवृद्धि और टेंडर की तैयारी साथ-साथ
सूत्रों के अनुसार नियामक आयोग जुलाई की शुरुआत में बिजली दरों में 30 से 45 फीसदी तक बढ़ोतरी पर सुनवाई करेगा. साथ ही आयोग अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को भेजेगा, जिसके बाद पावर कॉरपोरेशन निजीकरण की टेंडर प्रक्रिया शुरू करेगा.
राष्ट्रीय सुरक्षा और भ्रष्टाचार का मुद्दा
वक्ताओं ने बिजली व्यवस्था के निजीकरण को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताया और ऑपरेशन सिंदूर का उदाहरण देते हुए सरकारी नियंत्रण की जरूरत पर जोर दिया. साथ ही भ्रष्टाचार और अनियमितता की सीबीआई जांच की मांग की गई. महापंचायत ने प्रस्ताव वापस लिए जाने तक आंदोलन जारी रखने का संकल्प दोहराया. चेतावनी दी गई कि अगर इसे दबाने की कोशिश हुई तो पूरे राज्य में बड़ा आंदोलन खड़ा होगा. अब सबकी नजर सरकार और आयोग के अगले कदम पर है.