India: EOS-05 Satellite----भारत ने अंतरिक्ष निगरानी के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए देश का पहला जियोसिंक्रोनस जियो-इमेजिंग सैटेलाइट EOS-05 सफलतापूर्वक स्थापित किया है। करीब 36 हजार किलोमीटर की ऊंचाई से काम करने वाला यह उपग्रह सीमाओं, मौसम और प्राकृतिक आपदाओं पर लगातार नजर रखने में मदद करेगा। खास बात यह है कि अब रिमोट सेंसिंग डेटा के लिए विदेशी स्रोतों पर निर्भरता और खर्च कम करने की दिशा में भारत ने बड़ा कदम बढ़ाया है।
अंतरिक्ष में भारत की नई कामयाबी
EOS-05 को श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से GSLV-F17 रॉकेट के जरिए प्रक्षेपित किया गया। यह श्रीहरिकोटा से 107वां और GSLV का 19वां मिशन बताया गया है। 2300 किलोग्राम से ज्यादा वजनी उपग्रह को निर्धारित जियोसिंक्रोनस कक्षा में स्थापित किया गया है।
पहले विदेशी उपग्रहों पर थी निर्भरता
भारत में रिमोट सेंसिंग की शुरुआत के दौर में विदेशी उपग्रहों से मिलने वाले डेटा का इस्तेमाल किया जाता था। 1972 में अमेरिका ने पहला LANDSAT उपग्रह लॉन्च किया था। इसके बाद भारत ने 1979 में हैदराबाद में LANDSAT डेटा रिसीविंग स्टेशन बनाया, जहां विदेशी उपग्रहों से मिले चित्रों को प्राप्त कर प्रोसेस किया जाता था। फ्रांस के SPOT जैसे उपग्रहों से भी डेटा लिया जाता था।
डेटा के लिए चुकानी पड़ती थी भारी कीमत
विदेशी सैटेलाइट डेटा हासिल करना भारत के लिए महंगा सौदा था। 1990 के दशक में LANDSAT के एक Thematic Mapper सीन के लिए करीब 4,400 डॉलर तक भुगतान करना पड़ता था। इसके अलावा डेटा हासिल करने और प्रोग्रामिंग के लिए अलग शुल्क भी देना होता था। ऐसे में स्वदेशी क्षमता विकसित करना रणनीतिक और आर्थिक दोनों लिहाज से अहम माना गया।
24 घंटे निगरानी में मददगार
जियोसिंक्रोनस कक्षा में स्थापित EOS-05 पृथ्वी की घूर्णन गति के साथ तालमेल रखते हुए बड़े क्षेत्र पर लगातार नजर रख सकता है। इससे संवेदनशील सीमाई क्षेत्रों के साथ-साथ समुद्री इलाकों की निगरानी में मदद मिलेगी। मौसम और आपदा प्रबंधन के मोर्चे पर भी चक्रवात, भारी बारिश, बाढ़, भूस्खलन और जंगलों की आग जैसी घटनाओं की लगातार निगरानी संभव होगी।
हाइपरस्पेक्ट्रल तकनीक बनेगी खास ताकत
EOS-05 में उन्नत मल्टीस्पेक्ट्रल इमेजर लगाए गए हैं, जो अलग-अलग प्रकाश तरंगों में पृथ्वी की तस्वीरें लेने में सक्षम हैं। एक इमेजर का रिजॉल्यूशन 42 मीटर प्रति पिक्सल बताया गया है। इसकी हाइपरस्पेक्ट्रल तकनीक सैकड़ों बारीक वेवलेंथ बैंड में डेटा का अध्ययन कर जमीन, पानी, वनस्पति और पर्यावरणीय बदलावों की ज्यादा सटीक जानकारी जुटाने में मदद करेगी।