लोकसभा में बजट सत्र के दौरान राहुल गांधी ने जेफरी एपस्टीन का जिक्र कर राजनीतिक माहौल गर्म कर दिया। उन्होंने दावा किया कि कुछ भारतीय नाम एपस्टीन फाइल्स में हैं और इस पर सवाल उठाए जाने चाहिए। उनके बयान के बाद सदन में शोर-शराबा हुआ और मामला तुरंत राष्ट्रीय बहस बन गया। विपक्ष और सत्ता पक्ष आमने-सामने आ गए। मुद्दा सिर्फ एक नाम का नहीं रहा, बल्कि इसे बड़े राजनीतिक आरोप के रूप में देखा जाने लगा।
राहुल गांधी ने क्या कहा?
राहुल गांधी ने सदन में कहा कि एक बड़े उद्योगपति का नाम एपस्टीन फाइल्स में है और फिर भी उन पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई। उन्होंने यह भी पूछा कि उस उद्योगपति की मुलाकात किसने करवाई थी। सदन के बाहर भी उन्होंने दोहराया कि अमेरिकी न्याय विभाग के पास मौजूद दस्तावेजों में कुछ भारतीय नाम शामिल हैं। उनका कहना था कि इस पर सरकार को साफ जवाब देना चाहिए। राहुल के बयान से राजनीतिक तापमान और बढ़ गया।
हरदीप पुरी का जवाब
राहुल के आरोपों पर केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने तुरंत प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि एपस्टीन फाइल्स गंभीर आपराधिक मामलों से जुड़ी हैं और ऐसे मुद्दों को समझे बिना बयान देना ठीक नहीं है। पुरी ने स्पष्ट किया कि उनकी मुलाकात जेफरी एपस्टीन से एक अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधिमंडल के दौरान हुई थी और उसका किसी भी गलत गतिविधि से कोई संबंध नहीं था। उन्होंने कहा कि यह मुलाकात सार्वजनिक रिकॉर्ड में दर्ज है और छिपाने जैसा कुछ भी नहीं है।
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कब और कैसे हुई थी मुलाकात?
हरदीप पुरी ने बताया कि साल 2009 में जब वह अमेरिका में भारत के राजदूत थे, तब अंतरराष्ट्रीय पीस इंस्टिट्यूट के कार्यक्रम के तहत यह मुलाकात हुई थी। उन्होंने कहा कि उस समय कई सार्वजनिक कार्यक्रमों में अलग-अलग लोगों से मुलाकात होती थी। उन्होंने यह भी कहा कि इस संबंध में लाखों ईमेल और दस्तावेज सार्वजनिक डोमेन में मौजूद हैं। उनके मुताबिक, बाद में मंत्री बनने से पहले भी यह सारी जानकारी खुली थी।
रीड हॉफमैन का भी जिक्र
पुरी ने बताया कि एक कार्यक्रम के दौरान उनकी मुलाकात लिंक्डइन के संस्थापक रीड हॉफमैन से भी करवाई गई थी। उन्होंने कहा कि उस समय भारत में निवेश और अवसरों पर चर्चा हुई थी। पुरी के अनुसार, यह सामान्य कूटनीतिक बातचीत थी और इसे गलत तरीके से पेश किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि बेबुनियाद आरोप लगाना राजनीतिक आदत बनती जा रही है।
आगे क्या होगा?
एपस्टीन फाइल्स का मामला अब संसद से निकलकर सार्वजनिक बहस का विषय बन चुका है। विपक्ष सरकार से जवाब मांग रहा है, जबकि सरकार इसे निराधार आरोप बता रही है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा और गर्मा सकता है। फिलहाल दोनों पक्ष अपनी-अपनी बात पर कायम हैं और राजनीतिक टकराव जारी है।