भारत पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता कम करने और स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए एथेनॉल उत्पादन को तेजी से बढ़ा रहा है। एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम के जरिए देश में बायोफ्यूल की हिस्सेदारी बढ़ाने की दिशा में लगातार काम हो रहा है। हालांकि, एथेनॉल उत्पादन के साथ पानी की भारी खपत एक नई चुनौती बनकर सामने आ रही है। खास बात यह है कि एथेनॉल फैक्ट्रियों में सीधे बहुत कम पानी लगता है, जबकि सबसे ज्यादा पानी उन फसलों की खेती में खर्च होता है जिनसे एथेनॉल तैयार किया जाता है।
1 लीटर एथेनॉल के लिए हजारों लीटर पानी की जरूरत
एथेनॉल का वास्तविक वॉटर फुटप्रिंट काफी बड़ा होता है। फसल के प्रकार के आधार पर 1 लीटर एथेनॉल बनाने में करीब 2,800 लीटर से लेकर 10,790 लीटर तक पानी की जरूरत पड़ सकती है। इसमें सिंचाई, मिट्टी में मौजूद नमी और फसल की वृद्धि के दौरान इस्तेमाल होने वाला वर्षा जल भी शामिल होता है।
चावल से बनने वाला एथेनॉल सबसे ज्यादा पानी पीता है
एथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले प्रमुख कच्चे माल में चावल सबसे ज्यादा पानी की मांग करता है। एक लीटर एथेनॉल तैयार करने के लिए करीब 2.5 से 3 किलोग्राम चावल की जरूरत होती है और इसके लिए लगभग 10,790 लीटर पानी खर्च होता है। यही कारण है कि इसे एथेनॉल उत्पादन के सबसे अधिक जल-खपत वाले स्रोतों में गिना जाता है।
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मक्का और गन्ने के मुकाबले में कितना अंतर
मक्का भी भारत के एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम का अहम हिस्सा बन चुका है। मक्के से 1 लीटर एथेनॉल तैयार करने में लगभग 4,670 लीटर पानी की आवश्यकता होती है। वहीं गन्ने से एथेनॉल बनाने में क्षेत्र, मौसम और फसल की किस्म के आधार पर करीब 2,860 से 3,630 लीटर पानी खर्च होता है, जो चावल की तुलना में काफी कम है।
फैक्ट्री नहीं, खेती में खर्च होता है सबसे ज्यादा पानी
अक्सर यह माना जाता है कि एथेनॉल प्लांट उत्पादन के दौरान बहुत ज्यादा पानी इस्तेमाल करते हैं, लेकिन वास्तविकता इससे अलग है। डिस्टिलरी प्लांट में 1 लीटर एथेनॉल बनाने के लिए सीधे तौर पर केवल 3 से 5 लीटर पानी की जरूरत होती है। असली पानी की खपत खेती के चरण में होती है, जिसे ‘वर्चुअल वॉटर’ कहा जाता है।
भूजल पर बढ़ सकता है दबाव
विशेषज्ञों का मानना है कि चावल और गन्ने जैसी अधिक पानी मांगने वाली फसलों के जरिए बड़े पैमाने पर एथेनॉल उत्पादन से भूजल संसाधनों पर दबाव बढ़ सकता है। भारत के कई राज्यों में पहले ही भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है। ऐसे में भविष्य में एथेनॉल उत्पादन बढ़ाते समय ऊर्जा सुरक्षा और जल संरक्षण के बीच संतुलन बनाना सबसे बड़ी चुनौती होगी।