महंगे एलपीजी सिलेंडर और सप्लाई की चिंता के बीच एथेनॉल को रसोई के ईंधन के तौर पर इस्तेमाल करने की चर्चा तेज हो गई है। पेट्रोल में मिलाए जाने वाले एथेनॉल को अब चूल्हे में जलाने की संभावना पर भी काम होने की बात कही जा रही है। दावा है कि आने वाले समय में एथेनॉल से चलने वाले खास चूल्हे बाजार में आ सकते हैं। हालांकि यह बदलाव अभी शुरुआती सोच और तैयारी के स्तर पर है। एलपीजी को पूरी तरह बदलने की कोई तय समयसीमा सामने नहीं आई है।
कंपनियां कर रहीं तैयारी
इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम जैसी सरकारी तेल कंपनियों के नाम इस योजना से जोड़े जा रहे हैं। इन कंपनियों का काम एलपीजी की सप्लाई और साफ ईंधन के नए विकल्पों पर भी रहता है। सरकार की ग्रीन एनर्जी नीति के तहत एथेनॉल आधारित कुकिंग फ्यूल और उससे चलने वाले चूल्हों पर काम आगे बढ़ सकता है। फिलहाल कंपनियों की तरफ से घरेलू रसोई के लिए बड़े स्तर पर लॉन्च की साफ जानकारी नहीं आई है। इसलिए लोगों को इसे पक्का फैसला नहीं, बल्कि संभावित विकल्प मानना चाहिए।
क्यों बढ़ा एथेनॉल पर जोर
एथेनॉल का उत्पादन गन्ने के रस, मक्का, टूटे अनाज और दूसरे कृषि उत्पादों से किया जाता है। इससे किसानों को भी बाजार मिल सकता है और देश में बने ईंधन का इस्तेमाल बढ़ सकता है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा एलपीजी विदेशों से मंगाता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय तनाव या समुद्री रास्तों में रुकावट से सप्लाई और कीमत पर असर पड़ सकता है। इंडियन ऑयल के मुताबिक दिल्ली में 14.2 किलो वाला बिना सब्सिडी एलपीजी सिलेंडर 942 रुपये का है। ऐसे में सस्ता और देश में बनने वाला विकल्प खोजने की जरूरत महसूस हो रही है।
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धुआं कम होने का दावा
एथेनॉल से चलने वाले चूल्हे को लकड़ी, कोयला या उपले वाले चूल्हे से ज्यादा साफ विकल्प माना जाता है। इससे धुआं और घर के अंदर होने वाला प्रदूषण कम हो सकता है। खासकर उन घरों के लिए यह मददगार हो सकता है, जहां आज भी खाना बनाने के लिए ठोस ईंधन जलाया जाता है। लेकिन एथेनॉल भी ज्वलनशील तरल है, इसलिए इसके स्टोरेज, चूल्हे की बनावट और इस्तेमाल के नियम बहुत जरूरी होंगे। सुरक्षा जांच और सही उपकरण के बिना इसे घरों तक पहुंचाना आसान नहीं होगा।
कई देशों में हो रहा इस्तेमाल
अफ्रीका और एशिया के कई देशों में एथेनॉल को कुकिंग फ्यूल के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। केन्या, इथियोपिया, घाना, तंजानिया और मोजांबिक जैसे देशों में इसके चूल्हे घरों, हॉस्टल और कम्युनिटी किचन में देखे जाते हैं। फिलीपींस, थाईलैंड, ब्राजील और हैती में भी इस तरह के ईंधन का इस्तेमाल होता है। भारत में इसकी सफलता इस बात पर टिकी होगी कि ईंधन की कीमत कितनी रहेगी, सप्लाई कितनी आसान होगी और चूल्हे आम लोगों के बजट में आएंगे या नहीं।
सिलेंडर तुरंत नहीं जाएगा
एथेनॉल को एलपीजी का पूरा विकल्प बनने में अभी लंबा समय लग सकता है। देश में करोड़ों घर एलपीजी सिलेंडर और उसके मौजूदा नेटवर्क से जुड़े हैं। एथेनॉल के लिए अलग सप्लाई, सुरक्षित बोतलें, नए चूल्हे और लोगों को इस्तेमाल की जानकारी देनी होगी। इसलिए शुरुआत में यह एलपीजी के साथ चलने वाला दूसरा विकल्प बन सकता है। अगर कीमत कम रही और सुरक्षा पक्की हुई, तो गांवों, छोटे शहरों और सामूहिक रसोई में इसका इस्तेमाल बढ़ सकता है।