पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने भारत की आर्थिक स्थिति पर नया दबाव बना दिया है। असर सिर्फ कच्चे तेल तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उर्वरक यानी खाद की सप्लाई और कीमतों पर भी दिखने लगा है। आयात महंगा होने से सरकार के सामने दोहरी चुनौती खड़ी हो गई है—या तो सब्सिडी बढ़ाए या कीमतें बढ़ने दे, जिससे महंगाई तेज हो सकती है।
बढ़ती कीमतों ने बढ़ाई चिंता
मार्च 2026 तक यूरिया की कीमतें करीब 20 प्रतिशत तक बढ़ चुकी हैं। DAP 10 प्रतिशत से ज्यादा महंगा हो गया है, जबकि MOP में 23 प्रतिशत तक उछाल देखा गया है। अप्रैल में यूरिया की आयात कीमतें लगभग दोगुनी होकर 935 से 959 डॉलर प्रति मीट्रिक टन तक पहुंच गईं। सल्फर भी 50 प्रतिशत महंगा होकर 630 डॉलर प्रति टन हो गया, जिससे जटिल उर्वरकों की लागत और बढ़ गई।
राजकोषीय घाटे पर दबाव
निर्मला सीतारमण ने बजट 2026-27 में राजकोषीय घाटा GDP के 4.3 प्रतिशत तक सीमित रखने का लक्ष्य रखा था। लेकिन अब हालात बदलते दिख रहे हैं। उर्वरक, भोजन और पेट्रोलियम सब्सिडी अनुमान से ज्यादा बढ़ सकती है। क्रिसिल के मुताबिक उर्वरक सब्सिडी 1.92 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है, जबकि वास्तविक खर्च 2 लाख करोड़ रुपये के पार जाने की आशंका है।
घरेलू उत्पादन भी प्रभावित
सिर्फ आयात ही नहीं, घरेलू उत्पादन भी संकट में है। प्राकृतिक गैस की कमी और होर्मुज जलडमरूमध्य में बाधा के कारण मार्च 2026 में देश का यूरिया उत्पादन 25 प्रतिशत तक गिर गया। इससे सप्लाई चेन पर और दबाव बढ़ा है और आयात पर निर्भरता और गहरी हो गई है।
ये भी पढ़ें : सोना-चांदी में बड़ी गिरावट! MCX पर फिसले भाव, निवेशकों की बढ़ी टेंशन
आयात पर भारी निर्भरता
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा उर्वरक उपभोक्ता है, लेकिन इसकी निर्भरता काफी अधिक है। करीब 20 प्रतिशत यूरिया और 50 प्रतिशत DAP आयात करना पड़ता है। अगर कच्चे माल को जोड़ें तो कुल निर्भरता 70 प्रतिशत तक पहुंच जाती है। खाड़ी देशों से ही भारत अपनी बड़ी जरूरत पूरी करता है, जिससे वैश्विक संकट का सीधा असर देश पर पड़ता है।
क्या किसानों पर पड़ेगा असर
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इसका बोझ किसानों पर आएगा। फिलहाल सरकार ने साफ किया है कि किसानों पर सीधा असर नहीं पड़ने दिया जाएगा। डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर के जरिए पूरी सब्सिडी कंपनियों को दी जाएगी ताकि किसानों को स्थिर कीमत पर खाद मिल सके।
आगे की राह क्या होगी
हालात बताते हैं कि आने वाले महीनों में सरकार को संतुलन बनाना आसान नहीं होगा। एक तरफ बजट पर दबाव बढ़ेगा, दूसरी तरफ किसानों को राहत देना भी जरूरी है। अगर वैश्विक तनाव लंबा चला, तो खाद संकट भारत की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा सिरदर्द बन सकता है।