महिलाओं में खतना (FGM) की प्रथा को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए केंद्र सरकार और अन्य पक्षों को नोटिस जारी किया है। दाऊदी बोहरा समुदाय में प्रचलित यह परंपरा लंबे समय से विवाद में रही है। याचिकाकर्ता का कहना है कि महिला खतना न तो इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा है और न ही संविधान की भावना के अनुरूप। सुप्रीम कोर्ट की इस पहल से देश में मानवाधिकार और बच्चों की सुरक्षा पर नई बहस शुरू हो गई है।
किसने दायर की याचिका?
यह याचिका ‘चेतना वेलफेयर सोसाइटी’ नामक गैर-सरकारी संगठन द्वारा दायर की गई है। याचिका में दावा किया गया है कि महिला खतना की प्रथा धार्मिक तौर पर अनिवार्य नहीं है और यह बच्चों के मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन करती है। याचिकाकर्ता का कहना है कि पॉक्सो कानून के तहत किसी नाबालिग के जननांगों में गैर-चिकित्सकीय हस्तक्षेप करना स्पष्ट रूप से अपराध है और इसे रोकना आवश्यक है।
डब्ल्यूएचओ की चेतावनी और कानूनी पहलू
याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) महिला खतना को लड़कियों और महिलाओं के मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन मानता है।
भारत में पॉक्सो अधिनियम और भारतीय दंड संहिता के तहत ऐसे कृत्यों पर कठोर सजा का प्रावधान है।
याचिकाकर्ता का कहना है कि यह प्रथा संवैधानिक अधिकारों—विशेषकर अनुच्छेद 14 (समानता) और अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता)—की भी अवहेलना करती है।
2018 में केंद्र का रुख: सख्त विरोध
पिछले वर्षों में भी इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई की थी।
2018 में केंद्र सरकार ने स्पष्ट रूप से कहा था कि लड़कियों का खतना धर्म की आड़ में किया जाने वाला अपराध है और सरकार इसे रोकने का समर्थन करती है।
सरकार का रुख था कि यह कृत्य कानूनन दंडनीय है और इसके लिए सात साल तक की सजा हो सकती है।
पहले
की याचिका और राज्यों को
नोटिस
अतीत में अदालत ने इस मामले में केरल और तेलंगाना सरकारों को भी नोटिस जारी किए थे।
यह याचिका सुप्रीम कोर्ट की वकील सुनीता तिहाड़ द्वारा दायर की गई थी।
उन्होंने कहा था कि भारत ने UN Child Rights Convention पर हस्ताक्षर किए हैं, इसलिए महिला खतना जैसी अमानवीय प्रथा को जारी रखना किसी भी तरह से उचित नहीं है।
आगे क्या?
सुप्रीम कोर्ट के इस हस्तक्षेप से एक बार फिर देश में महिला सुरक्षा, धार्मिक प्रथाएं और मानवाधिकारों के बीच संतुलन पर बहस तेज होने की संभावना है।
अब केंद्र सरकार के जवाब और आगे की सुनवाई इस विवादित मुद्दे पर निर्णायक भूमिका निभाएंगे।