Soan Papdi History: दिवाली आते ही बाजारों में मिठाइयों की बहार आ जाती है। इस दौरान सोशल मीडिया के मजेदार मीम्स लेकर रिश्तेदारों के लेन-देन तक सबसे ज्यादा चर्चा सोन पापड़ी की होती है। भले ही लोग इसे रोटेट होने वाला गिफ्ट कहकर मजाक बनाएं, लेकिन इसके बेहतरीन स्वाद और कई महीनों तक खराब न होने की खूबी को कोई नकार नहीं सकता। आइए जानते हैं कि भारत की इस सबसे लोकप्रिय मिठाई का सफर और इतिहास क्या है।
कहां से आई सोन पापड़ी
सोन पापड़ी की शुरुआत को लेकर कोई पुख्ता लिखित दस्तावेज नहीं है, लेकिन इसे राजस्थान और महाराष्ट्र से जोड़कर देखा जाता है। खाने-पीने के विशेशज्ञ इसकी तुलना तुर्की की मशहूर पारंपरिक मिठाई पिस्मानिये से करते हैं। वह भी इसी की तरह रेशेदार और खस्ता होती है। बस उसमें बेसन की जगह भुना हुआ आटा इस्तेमाल होता है।
भारत में इसे सबसे पहले महाराष्ट्र के पश्चिमी शहरों के कारीगरों ने बेसन और चाशनी के मेल से बनाया था। धीरे-धीरे यह गुजरात, पंजाब और राजस्थान पहुंची और आज पूरे उत्तर भारत समेत देश के कोने-कोने में मशहूर है।
क्यों है यह इतनी टिकाऊ
मावा या खोये से बनी मिठाइयों में दूध का इस्तेमाल होता है। इसलिए वे जल्दी खराब हो जाती है। लेकिन सोन पापड़ी बनाने में दूध का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं होता। यह मुख्य रूप से बेसन, मैदे, देसी घी और चीनी से बनती है। इसी वजह से यह कम से कम 6 महीने तक तरोताजा रहती है और बड़े-बड़े ब्रांड्स इसे दूर दराज के इलाकों तक आसानी से सप्लाई कर पाते हैं।
दिवाली पर सबसे ज्यादा क्यों होती है गिफ्ट
काजू कतली या मावे की महंगी मिठाइयों के मुकाबले सोन पापड़ी काफी सस्ती होती है। बजट में होने के कारण कॉरपोरेट गिफ्टिंग और रिश्तेदारों में लेन-देन के लिए यह पहली पसंद बन जाती है।
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अलग-अलग नाम और खास स्वाद
देश के अलग-अलग हिस्सों में इसे सोहन पापड़ी, शोण पापड़ी, सन पापड़ी और शोम पापड़ी के नाम से जाना जाता है। इसे और स्वादिष्ट बनाने के लिए इसमें इलायची, पिस्ता, बादाम और खरबूज के बीज मिलाए जाते हैं, जो इसे एक खास खस्तापन और स्वाद देते हैं।
12 महीने रहती है मांग
यह सिर्फ दिवाली की मिठाई नहीं है। जानकारों के मुताबिक मोतीचूर के लड्डू और काजू कतली की तरह सोन पापड़ी भी साल के 12 महीने हर जगह उपलब्ध रहती है। चाहे रेलवे स्टेशन हो, एयरपोर्ट या गली-मोहल्ले की दुकान यह हर जगह आसानी से मिल जाती है।