अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष विराम होने के बाद वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें गिरनी शुरू हो गई हैं। इससे उम्मीद जगी थी कि हवाई यात्रा भी जल्द सस्ती हो जाएगी। हालांकि विमानन क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि अगले तीन से चार महीने तक फ्लाइट टिकट में किसी बड़ी राहत की संभावना नहीं है। एयरलाइंस पहले ही अपनी लागत और किराये की योजना तय कर चुकी हैं, इसलिए तेल सस्ता होने का फायदा यात्रियों तक तुरंत नहीं पहुंचेगा।
एटीएफ अभी भी पुराने स्तर से काफी ऊपर
हवाई जहाज में इस्तेमाल होने वाला ईंधन यानी एयर टर्बाइन फ्यूल विमानन कंपनियों का सबसे बड़ा खर्च होता है। ईरान-इजरायल संघर्ष शुरू होने से पहले की तुलना में एटीएफ की कीमतें अभी भी काफी ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं। कई मामलों में यह पहले की तुलना में लगभग दोगुनी बताई जा रही हैं। इसी वजह से एयरलाइंस को ज्यादा खर्च उठाना पड़ रहा है और टिकट कीमतों में कमी की कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई दे रही है।
ये भी पढ़ें : घरेलू गैस संकट के बीच बड़ी राहत, Hormuz पार कर भारत पहुंचा पहला LNG टैंकर
एयरलाइंस की लागत का बड़ा हिस्सा ईंधन
विशेषज्ञों के मुताबिक किसी भी एयरलाइन की कुल परिचालन लागत में 25 से 35 प्रतिशत तक हिस्सा ईंधन का होता है। पुराने विमानों वाली कंपनियों में यह खर्च 40 से 50 प्रतिशत तक पहुंच जाता है। युद्ध के दौरान ईंधन महंगा होने पर कई कंपनियों ने कुछ लागत खुद झेली और बाकी किराया बढ़ाकर यात्रियों से वसूली। अब जबकि यात्री बढ़े हुए किराये पर भी सफर कर रहे हैं, इसलिए एयरलाइंस के पास टिकट सस्ता करने का दबाव कम है।
तेल उत्पादन और सप्लाई सामान्य होने में लगेगा वक्त
जानकारों का कहना है कि युद्ध के दौरान खाड़ी क्षेत्र में कई तेल कुएं और संबंधित सुविधाएं प्रभावित हुई थीं। अब संघर्ष विराम के बाद भी उत्पादन और सप्लाई पूरी तरह सामान्य होने में समय लगेगा। बंद पड़े तेल कुओं, रिफाइनरियों और सप्लाई नेटवर्क को फिर से पूरी क्षमता पर लाने में कई सप्ताह या महीने लग सकते हैं। इसके अलावा तेल ढोने वाले जहाज भी सुरक्षा कारणों से खाड़ी क्षेत्र से दूर चले गए थे। ऐसे में होर्मुज जलडमरूमध्य खुलने के बावजूद ईंधन की कीमतों और फ्लाइट किरायों पर इसका असर धीरे-धीरे ही दिखाई देगा।