
482 साल पहले मेघा भगत जो कि तुलसीदास के समकालीन थे उन्होंने शुरू किया था। इसे दुनियां की सबसे प्राचीन लीला माना जाता है। जो कि रामलीला के साथ शुरू हुई थी। रामलीला की शुरुवात करने का श्रेय भी मेघा भगत को ही दिया जाता है। बाबा की नगरी काशी में दशहरे के बाद भरत मिलाप इस बार कई मायनों में ऐतिहासिक रहा। 482 साल पुरानी इस परंपरा में पहली बार सूर्य देव के दर्शन नहीं हुए, फिर भी चारों भाइयों का महामिलन पूरे भक्तिभाव और उल्लास के साथ सम्पन्न हुआ। शनिवार सुबह से ही वाराणसी में भारी बारिश हो रही थी, जिसके चलते ऐसा लग रहा था कि देश की सबसे प्राचीनतम भरत मिलाप की लीला कैसे होगी? चित्रकूट रामलीला समिति और काशी राज परिवार भी इसी सोच में डूबे हुए थे। लेकिन शाम 4:45 से 4:50 के बीच जब चारों भाईयों का महामिलन हुआ तो सियावर राम चंद्र की जय के उद्घोष से पूरा इलाका गुंजायमान हो गया।
पहली बार अनुपस्थित रहे सूर्य देव
इस परंपरा से जुड़े स्थानीय लोगों का कहना है कि 482 वर्षों से जब भी यह लीला होती रही है, तब चाहे कितनी भी बारिश हो या बादल हों, लेकिन सूर्य की किरणें इस क्षण जरूर झलकती थीं। लोग मानते हैं कि इस लीला में सूर्य देव “लाइट मैन” की भूमिका निभाते हैं। मगर इस बार घने बादलों के कारण सूर्य देव के दर्शन नहीं हो सके। वरिष्ठ संस्कृति कर्मी अमिताभ भट्टाचार्य बताते हैं कि यह संभवतः पहला अवसर है जब सूर्य देव अनुपस्थित रहे।
5 मिनट का महामिलन ने मोहा मन
हर साल की तरह इस बार भी शाम को केवल पांच मिनट के लिए चारों भाईयों का महामिलन हुआ। इस क्षण को देखने के लिए सामान्यत: लाखों लोग जुटते हैं, लेकिन इस बार बारिश के चलते भीड़ कम रही। मिलन के बाद भगवान राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न को पुष्पक विमान पर बैठाया गया। बनारस के यादव बंधु अपने कंधों पर इस पांच टन भारी विमान को उठाकर ले गए। यही इस लीला का चरम और भावनात्मक क्षण होता है।
काशी राज परिवार की परंपरा
काशी राज परिवार भी इस भरत मिलाप का साक्षी बनता रहा है। पिछले 229सालों से काशी नरेश शाही अंदाज में इस लीला में शामिल होते रहे। पूर्व काशी नरेश महाराज उदित नारायण सिंह ने इसकी शुरुआत की थी। 1796 में वह पहली बार इस लीला में शामिल हुए थे। तब से उनकी पांच पीढ़ियां इस परंपरा का निर्वहन करती चली आ रही हैं। आज भारी बारिश के बीच कुंवर अनंत नारायण सिंह भी मौजूद रहें और उन्होंने सोने की गिन्नी देकर प्रभु श्रीराम और सभी भाईयों का आशीर्वाद लिया।
आस्था पर भारी नहीं पड़ी बारिश
दशहरे के दूसरे दिन काशी में ये भरत मिलाप की लीला होती है। जिसमें प्रभु श्री राम अपने छोटे भाई लक्ष्मण के साथ भरत और शत्रुघ्न से गले मिलते हैं। शाम 4:45 से 4:50 के बीच चारों भाईयों का मिलन होता है। इस पांच मिनट के महामिलन को देखने के लिए लाखों लोगों की भीड़ एकत्रित होती है। भले ही बारिश के चलते भीड़ कम रही और सूर्य देव नहीं दिखे, लेकिन भक्तों के उत्साह में कमी नहीं आई। छतरियां और बरसाती लेकर लोग इस अद्वितीय क्षण के साक्षी बने। हर किसी के मन में यही भावना रही कि परंपरा और आस्था कभी थमती नहीं चाहे मौसम जैसा भी हो।