संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधार की बहस के बीच फ्रांस ने एक बार फिर भारत के समर्थन में अपनी आवाज बुलंद की है। संयुक्त राष्ट्र महासभा को भेजे गए एक पत्र में फ्रांस ने भारत के साथ जर्मनी, ब्राजील और जापान को भी सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता दिए जाने का समर्थन दोहराया है। इसके साथ ही अफ्रीकी देशों को अधिक प्रतिनिधित्व देने और परिषद के विस्तार की जरूरत पर भी जोर दिया गया है। फ्रांस का यह रुख वैश्विक संस्थाओं में संतुलित भागीदारी की मांग को और मजबूत करता है।
सुरक्षा परिषद में बदलाव की जरूरत पर जोर
संयुक्त राष्ट्र में फ्रांस के स्थायी प्रतिनिधि जेरोम बोनाफॉन्ट ने कहा कि सुरक्षा परिषद में सुधार को लेकर फ्रांस का रुख पहले की तरह स्पष्ट और मजबूत है। उनका मानना है कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए परिषद की संरचना में बदलाव जरूरी है, ताकि दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों और उभरती शक्तियों को बेहतर प्रतिनिधित्व मिल सके।
भारत समेत G4 देशों को स्थायी सदस्यता का समर्थन
फ्रांस ने भारत, जर्मनी, ब्राजील और जापान की स्थायी सदस्यता की दावेदारी का समर्थन दोहराया है। ये चारों देश G4 समूह का हिस्सा हैं और लंबे समय से सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग करते रहे हैं। फ्रांस का कहना है कि वैश्विक स्तर पर इन देशों की भूमिका और योगदान को देखते हुए उन्हें परिषद में स्थायी स्थान मिलना चाहिए।
अफ्रीका के प्रतिनिधित्व को लेकर भी उठाई आवाज
फ्रांस ने अफ्रीकी महाद्वीप के लिए दो नई स्थायी सीटें बनाने की मांग का भी समर्थन किया है। उसका मानना है कि इससे लंबे समय से चले आ रहे प्रतिनिधित्व के असंतुलन को दूर करने में मदद मिलेगी। साथ ही वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में अफ्रीकी देशों की भागीदारी भी मजबूत होगी।
सदस्य संख्या बढ़ाकर 25 करने का प्रस्ताव
फ्रांस ने सुरक्षा परिषद की कुल सदस्य संख्या 15 से बढ़ाकर 25 करने का सुझाव दिया है। उसका तर्क है कि वर्तमान समय की चुनौतियों और सदस्य देशों की बढ़ती भागीदारी को देखते हुए परिषद का विस्तार आवश्यक है। इससे प्रतिनिधित्व और कार्यक्षमता के बीच बेहतर संतुलन स्थापित किया जा सकेगा।
सुधार की बहस को मिल सकती है नई गति
भारत सहित कई देश लंबे समय से सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग उठाते रहे हैं। ऐसे समय में फ्रांस का दोबारा समर्थन सामने आना इस मुद्दे को नई मजबूती देने वाला कदम माना जा रहा है। हालांकि परिषद में किसी भी बड़े बदलाव के लिए सदस्य देशों के बीच व्यापक सहमति जरूरी होगी, लेकिन फ्रांस की यह पहल सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण संकेत मानी जा रही है।