हिंदी भाषा और भारतीय साहित्य पर गहराई से शोध करने वाली अंतरराष्ट्रीय विदुषी फ्रांसेस्का ओरसिनी को दिल्ली एयरपोर्ट से भारत में प्रवेश नहीं दिया गया। इटली में जन्मी और लंदन विश्वविद्यालय में हिंदी की प्रोफेसर फ्रांसेस्का ने दावा किया कि उनके पास पांच साल का वैध ई-वीजा था, लेकिन सरकार का कहना है कि उन्होंने वीजा नियमों का उल्लंघन किया। इस कार्रवाई के बाद साहित्य और अकादमिक जगत में नाराज़गी और आलोचना दोनों देखने को मिली।
कौन हैं फ्रांसेस्का ओरसिनी
इटली के मिलान शहर में जन्मीं फ्रांसेस्का हिंदी और दक्षिण एशियाई साहित्य की प्रोफेसर हैं। वे लंदन के स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंड
अफ्रीकन स्टडीज (SOAS) में पढ़ाती हैं। उन्होंने वाराणसी, इलाहाबाद और जेएनयू में लंबे समय तक अध्ययन किया। हिंदी के साथ उनका रिश्ता तब शुरू हुआ जब वे महज 20 वर्ष की थीं। प्रेमचंद की पोती से उनकी मित्रता और नामवर सिंह जैसे आलोचकों से शिक्षा ने उनके शोध को भारतीय दृष्टिकोण दिया।
वीजा विवाद और डिपोर्ट किए जाने का कारण
रिपोर्ट्स के अनुसार फ्रांसेस्का के पास पांच साल का वैध ई-वीजा था। वे चीन में एक शैक्षणिक सम्मेलन में शामिल होने के बाद हांगकांग से दिल्ली पहुंचीं। गृह मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, उन्होंने पहले पर्यटक वीजा का इस्तेमाल अकादमिक गतिविधियों के लिए किया था, जो वीजा नियमों का उल्लंघन है। इसी वजह से उन्हें मार्च 2025 से ब्लैकलिस्ट किया गया और भारत प्रवेश से रोक दिया गया। कुछ घंटों बाद उन्हें हांगकांग वापस भेज दिया गया।
साहित्य जगत की तीखी प्रतिक्रिया
इतिहासकारों और लेखकों ने इस कार्रवाई को “संकीर्ण मानसिकता” बताया। इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने कहा कि फ्रांसेस्का ने भारतीय साहित्य की समझ को गहराई दी है और उन्हें रोकना असंगत है। लेखक पुरुषोत्तम अग्रवाल ने कहा कि उनका शोध हिंदी लोकवृत्त के अध्ययन में मील का पत्थर है और यह स्पष्ट नहीं कि उन्होंने किसकी भावना आहत की।
फ्रांसेस्का का साहित्यिक योगदान
ओरसिनी ने उत्तर भारत की बहुभाषी परंपराओं, खासकर हिंदी-उर्दू के साझा साहित्यिक इतिहास पर महत्वपूर्ण काम किया है। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक “Print and Pleasure” इलाहाबाद की प्रिंट संस्कृति और लोक साहित्य को केंद्र में रखती है। वे कहती हैं—“मेरा दिल इलाहाबादी है।”