भारत ने अब तक 18 फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) पर हस्ताक्षर कर लिए हैं, लेकिन इसके बावजूद निर्यात में अपेक्षित तेजी नहीं दिख रही है। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) की रिपोर्ट के मुताबिक, नए समझौते करने के बजाय मौजूदा FTA से ठोस निर्यात लाभ निकालने पर ध्यान देना ज्यादा जरूरी है। खासकर इलेक्ट्रॉनिक्स, इंजीनियरिंग और टेक्सटाइल्स जैसे सेक्टर ऐसे हैं, जहां भारत अपनी पकड़ मजबूत कर सकता है, लेकिन अभी इनका पूरा फायदा नहीं मिल पा रहा।
निर्यात की मौजूदा तस्वीर
रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2025 में भारत का कुल निर्यात 825 अरब डॉलर रहा, जबकि वित्त वर्ष 2026 में इसके करीब 850 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। यानी बढ़ोतरी बेहद सीमित है। इसकी बड़ी वजह कमजोर अंतरराष्ट्रीय मांग और अमेरिकी टैरिफ माने जा रहे हैं। माल निर्यात में खास उछाल की उम्मीद नहीं है, हालांकि सर्विस सेक्टर राहत दे सकता है। अनुमान है कि सर्विस एक्सपोर्ट 400 अरब डॉलर से ज्यादा हो सकता है, जिससे कुल व्यापार को कुछ सहारा मिलेगा।
ये भी पढ़ें : 2025 में किसका खेल बिगड़ा, कौन हुआ मालामाल? भारत के अरबपतियों की किस्मत ने लिया चौंकाने वालामोड़
अमेरिका और टैरिफ का दबाव
GTRI के मुताबिक, अमेरिका इस समय भारत के लिए सबसे बड़ा दबाव बनकर उभरा है। डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन द्वारा WTO नियमों से हटकर लगाए गए भारी टैरिफ का सीधा असर भारतीय निर्यात पर पड़ा है। मई से नवंबर 2025 के बीच 50 फीसदी तक के टैरिफ के चलते अमेरिका को भारत का निर्यात करीब 21 फीसदी घट गया। रिपोर्ट चेतावनी देती है कि अगर रूस से तेल खरीद को लेकर लगाए गए अतिरिक्त 25 फीसदी दंडात्मक टैरिफ नहीं हटे, तो अमेरिका को निर्यात और गिर सकता है।
यूरोप की नई चुनौती
यूरोप भी भारत के लिए नई मुश्किलें खड़ी कर रहा है। यूरोपीय संघ 1 जनवरी 2026 से कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म लागू करेगा, जिसके तहत आयात पर कार्बन टैक्स लगेगा। इसके संकेत अभी से दिखने लगे हैं और यूरोपीय संघ को भारत के इस्पात निर्यात में करीब 24 फीसदी की गिरावट आ चुकी है। हालांकि, इन चुनौतियों के बीच एक सकारात्मक संकेत यह है कि अमेरिका के अलावा अन्य वैश्विक बाजारों में भारत का निर्यात करीब 5.5 फीसदी बढ़ा है। GTRI का मानना है कि मौजूदा वैश्विक हालात में भारत को नए समझौतों से ज्यादा अपने घरेलू सुधार और मौजूदा FTA के बेहतर इस्तेमाल पर फोकस करना चाहिए।