देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में हालिया 3 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी के बाद अब आने वाले महीनों को लेकर नई चिंता सामने आई है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं तो अगले 3 से 4 महीनों तक ईंधन महंगा हो सकता है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और सप्लाई संकट की आशंका ने तेल बाजार को अस्थिर कर दिया है, जिसका सीधा असर भारत पर पड़ सकता है।
चार साल बाद बढ़े दाम, आगे भी जारी रह सकता है असर
देश में करीब चार साल बाद पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। तेल कंपनियों पर लगातार बढ़ते लागत दबाव के कारण दाम बढ़ाने का फैसला लिया गया। विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा बढ़ोतरी केवल शुरुआती राहत है और यदि वैश्विक बाजार में कच्चा तेल महंगा बना रहता है तो आगे भी कीमतों में संशोधन जारी रह सकता है।
110 डॉलर के करीब पहुंचा कच्चा तेल
अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतें 110 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच चुकी हैं। पश्चिम एशिया में जारी तनाव और सप्लाई बाधित होने की आशंका ने तेल बाजार में चिंता बढ़ा दी है। जानकारों का मानना है कि यदि कच्चा तेल लंबे समय तक 90 से 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बना रहता है तो घरेलू ईंधन कीमतों पर और दबाव बढ़ेगा।
अगले 4 महीनों में और बढ़ सकते हैं दाम
ऊर्जा बाजार के विशेषज्ञों के अनुसार तेल कंपनियां लंबे समय से नुकसान झेल रही थीं। ऐसे में मौजूदा बढ़ोतरी से उन्हें आंशिक राहत जरूर मिलेगी, लेकिन घाटे की पूरी भरपाई के लिए आने वाले महीनों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में और बढ़ोतरी संभव है। अनुमान है कि कुल मिलाकर ईंधन कीमतों में करीब 10 रुपये प्रति लीटर तक का अतिरिक्त इजाफा करना पड़ सकता है।
भारत की आयात निर्भरता बढ़ा रही चिंता
भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। यही वजह है कि वैश्विक बाजार में होने वाले उतार-चढ़ाव का सीधा असर घरेलू ईंधन कीमतों पर पड़ता है। भू-राजनीतिक तनाव और तेल सप्लाई में बाधा जैसी स्थितियां भारतीय बाजार के लिए बड़ी चुनौती बन सकती हैं।
महंगाई और घरेलू बजट पर पड़ेगा असर
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि पेट्रोल-डीजल के लगातार बढ़ते दाम आने वाले समय में महंगाई को और बढ़ा सकते हैं। परिवहन और लॉजिस्टिक्स लागत बढ़ने से रोजमर्रा की चीजें महंगी हो सकती हैं। इसका असर सीधे घरेलू बजट पर पड़ेगा। हालांकि माना जा रहा है कि सरकार जरूरत पड़ने पर हस्तक्षेप कर कीमतों को नियंत्रित करने की कोशिश कर सकती है।