उत्तर प्रदेश के अयोध्या जिले में बन रहे भव्य राम मंदिर के पहले तल पर आठ नए मंदिर बनाए गए हैं, जिनमें राम दरबार समेत कई देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित होनी हैं। इन सभी मंदिरों की प्राण प्रतिष्ठा एक साथ गंगा दशहरा के दिन (5 जून) कराने का निर्णय पहले लिया गया था। इसके लिए देशभर के 100 से अधिक आचार्यों और विद्वानों से विचार विमर्श किया गया था।
अभिजीत मुहूर्त को सबसे श्रेष्ठ
प्राण प्रतिष्ठा के लिए गंगा दशहरा की तिथि को इसलिए चुना गया क्योंकि इस दिन ‘अभिजीत मुहूर्त’ लग रहा है, जिसे सभी आचार्यों ने शुभ माना। यह वही समय है जब द्वापर युग का प्रारंभ भगवान कृष्ण की आभा से हुआ था।
शिवलिंग की प्रतिष्ठा में आई अड़चन
एक बड़ी अड़चन भगवान शंकर के शिवलिंग को लेकर आ गई. दरअसल गंगा दशहरा के दिन शिववास का कोई मुहूर्त ही नहीं था। जिसकी वजह से शिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा में अर्चना रही है जिसके लिए पांच दिन पहले यानी 31 मई को ही शिववास करा दिया जाएगा। इसी फैसले के तहत 31 मई को परकोटे में विराजित शिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा की जाएगी।
प्राण प्रतिष्ठा के लिए दो तिथि क्यों?
विद्वानों के अनुसार सबकुछ तिथि और मुहूर्त की वजह से है। जहां तक राम मंदिर का सवाल है तो यहां तो इन्हीं तिथि और मुहूर्तों को लेकर कई-कई दिन तक चर्चा चली है। इस प्रसंग में चर्चा में भी इसी विषय पर करेंगे।
राम मंदिर में पहले भी थी तिथि की उलझन
यह पहली बार नहीं है जब राम मंदिर से जुड़ी किसी धार्मिक प्रक्रिया में तिथि और मुहूर्त को लेकर चर्चा हुई है। इससे पहले मुख्य राम मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के लिए भी लंबी चर्चा चली थी। तब 100 से अधिक आचार्यों की राय के बाद 22 जनवरी, पौष शुक्ल द्वादशी को चुना गया था — जिस दिन समुद्र मंथन के दौरान भगवान विष्णु ने कूर्मावतार लिया था।उस समय भी सभी विद्वानों की राय के बाद 22 जनवरी यानी पौष शुक्ल द्वादशी की तिथि निर्धारित हुई। दरअसल इसी तिथि को समुंद्र मंथन के समय भगवान नारायण का कूर्मावतार हुआ था।