Garuda Purana Rules: हिंदू धर्म में जन्म और मृत्यु से जुड़े कई संस्कार और परंपराएं बताई गई हैं, जिनका पालन सदियों से किया जाता रहा है। परिवार में किसी सदस्य के निधन के बाद कुछ समय के लिए कई तरह के धार्मिक नियमों का पालन किया जाता है। इन्हीं परंपराओं में से एक है मृत्यु के बाद घर में चूल्हा न जलाना और भोजन न बनाना। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसका संबंध मृत आत्मा की शांति और परिवार द्वारा शोक व्यक्त करने से जुड़ा हुआ है। गरुड़ पुराण में भी मृत्यु के बाद किए जाने वाले कई नियमों और कर्मकांडों का उल्लेख मिलता है। आइए जानते हैं मृत्यु के बाद घर में खाना बनाने की मनाही क्यों होती है और इससे जुड़ी मान्यताएं क्या हैं।
मृत्यु के बाद क्यों नहीं बनाया जाता घर में खाना?
हिंदू मान्यताओं के अनुसार, परिवार में किसी व्यक्ति की मृत्यु होने के बाद घर में मरण सूतक लग जाता है। इस अवधि को शोक और आत्मिक शांति का समय माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि मृत्यु के बाद आत्मा अपने परिजनों के आसपास रहती है, इसलिए इस समय घर में पूजा-पाठ, उत्सव और सामान्य गतिविधियों से दूरी बनाई जाती है। इसी कारण कई परंपराओं में चूल्हा जलाने और भोजन बनाने से परहेज करने की बात कही गई है।
सूतक काल में माने जाते हैं ये नियम
मृत्यु के बाद परिवार को सूतक काल के नियमों का पालन करना पड़ता है। इस दौरान नए कपड़े पहनना, शुभ कार्य करना, उत्सव मनाना और कई जगहों पर घर में भोजन बनाना भी वर्जित माना जाता है। अलग-अलग क्षेत्रों और परंपराओं के अनुसार सूतक की अवधि अलग हो सकती है। कई जगहों पर इसे 10 या 13 दिनों तक मानने की परंपरा है।
शोक के कारण भी नहीं जलता चूल्हा
मृत्यु के बाद घर का माहौल दुख और शोक से भरा होता है। परिवार के सदस्य मानसिक रूप से परेशान होते हैं और कई बार खाना बनाने की स्थिति में नहीं होते। ऐसे समय में रिश्तेदार और आसपास के लोग परिवार के लिए भोजन की व्यवस्था करते हैं। इसलिए चूल्हा न जलाने के पीछे धार्मिक मान्यता के साथ-साथ एक भावनात्मक और सामाजिक कारण भी जुड़ा हुआ है।
कब दोबारा जलाया जाता है घर का चूल्हा?
मान्यताओं के अनुसार, सूतक काल समाप्त होने के बाद घर की शुद्धि की जाती है और धार्मिक विधि पूरी करने के बाद ही चूल्हा जलाया जाता है। इसके बाद सबसे पहले सात्विक और साधारण भोजन बनाया जाता है। कुछ परंपराओं में तीसरे दिन के बाद भी घर में भोजन बनाने की अनुमति मानी जाती है, जबकि कई परिवार 13वें दिन के बाद यह प्रक्रिया शुरू करते हैं।
डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी ज्योतिष शास्त्र पर आधारित है तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है. Loksatya इसकी पुष्टि नहीं करता है।