गौतमबुद्धनगर। विशेष प्रगाढ़ पुनरीक्षण (Special Intensive Revision - SIR) कार्यक्रम को लेकर जिलाधिकारी मेधा रूपम भले ही दिन-रात एक कर रही हों, लेकिन जिले की राजनीतिक पार्टियां अब तक गहरी नींद में दिख रही हैं। 1 जनवरी 2026 की अर्हता तिथि के आधार पर मतदाता सूची को दुरुस्त करने का यह आखिरी बड़ा अभियान है, लेकिन बूथ लेवल एजेंट (BLA) की सक्रियता का आंकड़ा शर्मसार करने वाला है। खासकर जेवर विधानसभा क्षेत्र (निर्वाचन क्षेत्र क्रमांक-63) में तो स्थिति बेहद गंभीर है – यहां BLA सक्रियता 0% दर्ज की गई है। दादरी (62) में महज 47.92% और नोएडा (61) में 35.25% BLA ही अपने बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) से संपर्क कर पाए हैं। यानी जिले में औसतन भी आधे से कम BLA ही मैदान में उतरे हैं।
जिलाधिकारी ने रविवार को कैंप कार्यालय में हुई बैठक में साफ चेतावनी दी थी कि “BLO-BLA समन्वय के बिना SIR सफल नहीं हो सकता” और “कोई शिथिलता बर्दाश्त नहीं की जाएगी”। प्रशासन ने तो अपनी तरफ से कमर कस ली है – 96% गणना प्रपत्र (Form-12) बांटे जा चुके हैं, संकलन भी तेजी से चल रहा है। सभी मान्यता प्राप्त दलों के जिला अध्यक्षों को पत्र लिखे जा रहे हैं, व्यक्तिगत फोन किए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यही है कि पार्टियों के जिला मुख्यालय से लेकर बूथ स्तर तक कोई खास हलचल नहीं दिख रही।
सूत्र बताते हैं कि बीजेपी, बसपा, सपा और कांग्रेस – कोई भी दल इस मामले में आगे नहीं आना चाहता। फोन उठाओ तो “हम देख रहे हैं”, “जल्दी ही BLA को एक्टिव करेंगे”, “लीडरशिप से बात कर लेंगे” जैसे जवाब मिलते हैं। जेवर में शून्य प्रतिशत सक्रियता को लेकर जब पार्टियों के स्थानीय नेताओं से पूछताछ की गई तो सबने पल्ला झाड़ लिया – “हमारे पास BLA की लिस्ट तो भेज दी गई थी”, “BLO खुद संपर्क नहीं कर रहे”, “यह तो प्रशासन की जिम्मेदारी है” जैसे बहाने शुरू हो गए।
दरअसल, SIR का असली मकसद नए मतदाताओं का पंजीकरण, मृत/स्थानांतरित मतदाताओं का नाम कटवाना और डुप्लीकेट प्रविष्टियां हटाना है। इसके लिए BLO के साथ BLA का घर-घर जाना जरूरी है। लेकिन जब BLA ही गायब हैं तो यह सारा अभियान एकतरफा होकर रह जाता है और बाद में चुनाव के समय यही पार्टियां “मतदाता सूची में धांधली” का रोना रोती हैं।
अब जिलाधिकारी ने साफ निर्देश दे दिया है कि अगले दो दिनों में हर विधानसभा में रोस्टर के अनुसार BLO-BLA समन्वय बैठकें अनिवार्य रूप से होंगी। देखना यह है कि क्या राजनीतिक दल अपनी सुस्ती त्यागकर मैदान में उतरते हैं या फिर एक बार फिर प्रशासन अकेले दौड़ता रहेगा और बाद में सब मिलकर “सिस्टम की खामी” का ठीकरा एक-दूसरे के सिर फोड़ेंगे।
फिलहाल गौतमबुद्धनगर की मतदाता सूची की सेहत के लिए सबसे बड़ा खतरा यही राजनीतिक उदासीनता बनकर सामने आ रही है।