मध्यप्रदेश के अशोकनगर में हाल ही में जारी एक गजट नोटिफिकेशन ने शाकाहारी समाज को हैरान और नाराज़ कर दिया है। केंद्रीय कृषि मंत्रालय के इस आदेश में टमाटर और आलू जैसी रोज़मर्रा की सब्जियों में पशु-आधारित प्रोटीन और चर्बी से बने फर्टिलाइज़र के उपयोग की सिफारिश की गई है। 13 अगस्त 2025 को जारी यह नोटिफिकेशन अब पूरे देश में बहस और विरोध का केंद्र बन गया है। लोग इसे धार्मिक आस्था और शाकाहारी जीवनशैली पर सीधा हमला मान रहे हैं।
क्या है पूरा मामला
13 अगस्त 2025 को कृषि मंत्रालय की ओर से गजट नोटिफिकेशन में संशोधन कर नए प्रावधान जोड़े गए। इसके तहत आलू और टमाटर की फसलों में ऐसे बायो-स्टिमुलेट्स के उपयोग की मंजूरी दी गई है, जिनमें मछलियों, गौवंशीय पशुओं के मांस, चमड़े और खाल से निकाले गए प्रोटीन हाईड्रोलाईजेट शामिल हैं। नोटिफिकेशन के आईटम नंबर 26 के अनुसार, आलू की फसलों में मछलियों के मांस और खाल से बने प्रोटीन का प्रयोग फर्टिलाइज़र के रूप में किया जा सकता है। वहीं आईटम नंबर 30 में टमाटर की फसलों के लिए गाय-बैल के मांस और चमड़े से प्राप्त प्रोटीन के उपयोग की सिफारिश है।
धार्मिक समाज की कड़ी आपत्ति
शाकाहारी समाज ने इस कदम को न सिर्फ अपनी धार्मिक भावनाओं पर हमला बताया है, बल्कि इसे जीवन के अधिकार (अनुच्छेद 21) का उल्लंघन भी माना है। उनका कहना है कि पौधों से प्राप्त प्राकृतिक अमीनो एसिड—जैसे सोयाबीन, दलहन या समुद्री शैवाल—की उपलब्धता के बावजूद मंत्रालय ने कत्लखानों और चमड़ा उद्योग से निकलने वाले अवशेषों को मंजूरी दी। इससे न सिर्फ खाद्य श्रृंखला में पशु आधारित तत्व घुसेंगे, बल्कि स्लॉटर हाउस लॉबी को भी लाभ होगा।
विरोध की लहर और खतरे की चेतावनी
स्थानीय संगठनों ने केंद्रीय कृषि मंत्री को पत्र भेजकर इस फैसले को तुरंत रद्द करने की मांग की है। ग्रामीणों का कहना है कि यह आदेश चुपके से शाकाहारी समाज की थाली में नॉन वेज घुसाने का रास्ता खोल सकता है। इस विवाद के बाद से सोशल मीडिया पर #TomatoPotatoControversy ट्रेंड कर रहा है।