
श्रावण मास को भगवान शिव का सबसे प्रिय महीना माना जाता है। इस पूरे महीने में शिवभक्त व्रत, पूजन और रुद्राभिषेक आदि के माध्यम से महादेव को प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं। सावन में आने वाले प्रदोष व्रत का भी विशेष महत्व होता है, खासकर जब यह व्रत महीने का अंतिम प्रदोष हो। मान्यता है कि सावन के अंतिम प्रदोष व्रत पर भोलेनाथ की पूजा से विशेष फल की प्राप्ति होती है और भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
क्या है प्रदोष व्रत?
प्रदोष व्रत हर महीने की त्रयोदशी तिथि को आता है, और जब यह व्रत सोमवार या शनिवार को पड़ता है, तो इसका महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है। सावन के अंतिम प्रदोष व्रत का विशेष महत्व इसलिए भी है क्योंकि यह श्रावण मास के पुण्यकाल का समापन करता है। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा कर विशेष आशीर्वाद प्राप्त किया जा सकता है।
ऐसे करें आसान पूजन विधि
स्नान और संकल्प: सुबह ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान करें और व्रत का संकल्प लें।
शिवलिंग अभिषेक: दूध, दही, शहद, घी और गंगाजल से शिवलिंग का पंचामृत अभिषेक करें।
बिल्वपत्र अर्पण: बेलपत्र पर चंदन से “ॐ नमः शिवाय” लिखकर शिवलिंग पर चढ़ाएं।
धूप-दीप और नैवेद्य: भगवान को धूप, दीप, फूल और नैवेद्य (फल-मिठाई) अर्पित करें।
आरती और मंत्र जाप: शिव आरती करें और 108 बार “ॐ नमः शिवाय” का जाप करें।
विशेष उपाय
इस दिन काले तिल जल में डालकर शिवलिंग पर अर्पित करने से पापों का नाश होता है। साथ ही, गरीबों को भोजन या वस्त्र दान करने से पुण्यफल कई गुना बढ़ जाता है। सावन का अंतिम प्रदोष व्रत आत्मशुद्धि, मनोकामना पूर्ति और शिवकृपा प्राप्ति का अद्भुत अवसर है। सरल पूजन विधि और सच्चे मन से किया गया व्रत निश्चित ही भगवान शिव को प्रसन्न करता है। इस दिन को खास बनाएं और शिव की अनुकंपा से अपने जीवन को सुख, शांति और समृद्धि से भर दें।