कभी दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था रहा जापान अब पांचवें स्थान पर है। सरकारी कर्ज के मामले में जापान दुनिया में सबसे ऊपर है। वहां सरकार पर कुल कर्ज देश की जीडीपी का करीब 237 प्रतिशत पहुंच चुका है। 2025 के अंत तक जापान का सरकारी कर्ज लगभग 8.6 ट्रिलियन डॉलर तक बताया जा रहा है। यह आंकड़ा दिखाता है कि विकसित देश भी कर्ज के दबाव से अछूते नहीं हैं।
सिंगापुर से लेकर ग्रीस तक भारी बोझ
जापान के बाद सिंगापुर का नाम आता है, जहां सरकारी कर्ज जीडीपी का करीब 173 प्रतिशत है। ग्रीस और इटली जैसे यूरोपीय देश भी 150 प्रतिशत से ज्यादा के स्तर पर हैं। अमेरिका, जो दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, वहां भी सरकारी कर्ज जीडीपी के लगभग 154 प्रतिशत के आसपास है। फ्रांस, कनाडा, स्पेन और पुर्तगाल जैसे देशों की स्थिति भी कुछ अलग नहीं है।
अमेरिका और यूरोप की चुनौती
अमेरिका लंबे समय से बड़े बजट घाटे से जूझ रहा है। रक्षा खर्च, सामाजिक योजनाएं और आर्थिक पैकेजों के कारण उसका कर्ज लगातार बढ़ा है। यूरोप के कई देशों पर भी भारी कर्ज है, खासकर वे देश जो आर्थिक संकट या लंबे समय तक मंदी से गुजरे हैं। यूके, यूक्रेन और चीन जैसे देश भी ऊंचे कर्ज अनुपात के साथ इस सूची में शामिल हैं।
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भारत किस स्थिति में है?
भारत इस सूची में 17वें स्थान पर है। यहां सरकारी कर्ज जीडीपी का लगभग 81.9 प्रतिशत है। यह कई विकसित देशों से कम है, लेकिन फिर भी ध्यान देने योग्य है। भारत सरकार ने हाल के वर्षों में बुनियादी ढांचे और सामाजिक योजनाओं पर खर्च बढ़ाया है, जिससे कर्ज का स्तर ऊपर गया है। हालांकि, अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर मजबूत रहने से इसे संतुलित रखने की कोशिश की जा रही है।
अन्य देशों से तुलना
भारत के बाद ऑस्ट्रिया का नाम आता है, जहां कर्ज अनुपात लगभग 81.8 प्रतिशत है। दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील और हंगरी जैसे देशों में भी सरकारी कर्ज 70 से 80 प्रतिशत के बीच है। वहीं जर्मनी का कर्ज करीब 62 प्रतिशत और स्विट्जरलैंड का सिर्फ 15 प्रतिशत के आसपास है। इससे साफ है कि हर देश की आर्थिक नीति और हालात अलग-अलग होते हैं।
क्या भारत के लिए चिंता की बात?
विशेषज्ञ मानते हैं कि कर्ज का स्तर तभी चिंता का विषय बनता है जब आर्थिक वृद्धि कमजोर हो जाए। फिलहाल भारत की अर्थव्यवस्था तेज गति से बढ़ रही है, जिससे कर्ज संभालना आसान होता है। फिर भी सरकार के लिए जरूरी है कि खर्च और राजस्व के बीच संतुलन बनाए रखा जाए। आने वाले वर्षों में आर्थिक नीतियां तय करेंगी कि भारत सुरक्षित राह पर रहता है या दबाव बढ़ता है।