पाकिस्तान एक बार फिर वैश्विक कूटनीति के केंद्र में है, जहां अमेरिका और ईरान के बीच संभावित बातचीत की कोशिशें हो रही हैं। लेकिन इस पहल के साथ सबसे बड़ा सवाल सुरक्षा को लेकर खड़ा हो गया है। आतंकवाद के लंबे इतिहास, विदेशी प्रतिनिधियों पर हमलों और अस्थिर हालात को देखते हुए यह मुलाकात जोखिम भरी मानी जा रही है। ऐसे में दुनिया की नजर अब इस बात पर है कि क्या पाकिस्तान इस परीक्षा में खरा उतर पाएगा।
आतंकवाद की पुरानी परछाई
पाकिस्तान दशकों से आतंकवाद की मार झेलता आया है। तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान जैसे संगठनों ने कई बार सुरक्षा बलों और विदेशी नागरिकों को निशाना बनाया है। ये हमले न सिर्फ देश के अंदर अस्थिरता पैदा करते हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की छवि को भी नुकसान पहुंचाते हैं। यही वजह है कि हर हाई-प्रोफाइल दौरे के समय खतरे की आशंका बढ़ जाती है।
2009: जब क्रिकेट भी बन गया निशाना
श्रीलंका राष्ट्रीय क्रिकेट टीम पर 3 मार्च 2009 को लाहौर में हुआ हमला आज भी सुरक्षा चूक का बड़ा उदाहरण माना जाता है। गद्दाफी स्टेडियम के पास टीम बस पर हुई गोलीबारी में कई पुलिसकर्मी मारे गए और खिलाड़ी घायल हुए। इस घटना ने यह साबित कर दिया कि पाकिस्तान में अंतरराष्ट्रीय मेहमान भी सुरक्षित नहीं माने जाते।
सेना और स्कूल तक नहीं बचे
पाकिस्तान सेना पर हुए हमले लगातार सुरक्षा ढांचे की कमजोरी उजागर करते रहे हैं। पेशावर आर्मी पब्लिक स्कूल हमला जैसे भयावह हमले में मासूम बच्चों तक को नहीं बख्शा गया। इन घटनाओं ने यह संदेश दिया कि आतंकी नेटवर्क कितने गहरे और संगठित हैं।
डिप्लोमेट्स भी रहे निशाने पर
विदेशी प्रतिनिधि और संस्थान भी आतंकियों के टारगेट से बच नहीं पाए हैं। कराची और इस्लामाबाद में अमेरिकी नागरिकों और अन्य विदेशी अधिकारियों पर हमले हो चुके हैं। अपहरण और धमकियों की घटनाएं भी सामने आती रही हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की विश्वसनीयता पर सवाल उठे हैं।
अब अमेरिकी-ईरानी बातचीत पर खतरे की नजर
इस्लामाबाद में प्रस्तावित बातचीत में जेडी वैंस, स्टीव विटकोफ और जैरेड कुश्नर जैसे नाम सामने आ रहे हैं। पाकिस्तान सरकार ने कड़ी सुरक्षा का दावा किया है, लेकिन पुराने हमलों का इतिहास यह बताता है कि खतरा अभी भी खत्म नहीं हुआ है।
क्रिमिनल माइंड के नजरिए से देखें तो ऐसे हाई-प्रोफाइल टारगेट आतंकियों के लिए “हाई-वैल्यू ऑपरेशन” बन जाते हैं, जहां एक छोटी चूक भी बड़े अंतरराष्ट्रीय संकट में बदल सकती है।