सोने की कीमतें लगातार नई ऊंचाइयों को छू रही हैं और रुकने का नाम नहीं ले रहीं। आम निवेशक से लेकर बड़े कारोबारी तक सोने की ओर रुख कर रहे हैं। लेकिन इस तेजी के पीछे सिर्फ बाजार की मांग नहीं है। असली वजह दुनिया के केंद्रीय बैंकों की बदली हुई सोच है। जब वैश्विक अर्थव्यवस्था और राजनीति में अनिश्चितता बढ़ती है तब सोना सबसे सुरक्षित संपत्ति माना जाता है। यही कारण है कि ऊंचे दामों के बावजूद केंद्रीय बैंक बड़े पैमाने पर सोने की खरीद कर रहे हैं। इससे साफ संकेत मिलता है कि आने वाले समय में भी सोने की अहमियत बनी रहने वाली है।
भारत और चीन की बदली रणनीति
सोने की कीमतों में तेजी के पीछे भारत और चीन की भूमिका भी काफी अहम मानी जा रही है। इन दोनों देशों ने अमेरिकी सरकारी बॉन्ड में अपना निवेश घटाया है और सोने की खरीद बढ़ाई है। यह कोई अस्थायी फैसला नहीं बल्कि लंबे समय की रणनीति का हिस्सा है। दोनों देश अपने विदेशी मुद्रा भंडार को ज्यादा सुरक्षित और संतुलित बनाना चाहते हैं। अमेरिकी कर्ज पर निर्भरता कम कर सोने को प्राथमिकता देना इसी दिशा में उठाया गया बड़ा कदम माना जा रहा है।
भारतीय रिजर्व बैंक की सोच
भारत में यह बदलाव भारतीय रिजर्व बैंक की योजनाबद्ध नीति का नतीजा है। अमेरिकी सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत ने अमेरिकी सरकारी बॉन्ड में अपना निवेश कम किया है। एक साल के भीतर इसमें बड़ी गिरावट दर्ज की गई। इसके उलट भारतीय रिजर्व बैंक ने अपने सोने के भंडार में बढ़ोतरी की है। अक्टूबर दो हजार पच्चीस तक भारत के पास मौजूद सोने की मात्रा बढ़कर आठ सौ अस्सी मीट्रिक टन से ज्यादा हो गई। खास बात यह है कि इस दौरान भारत का कुल विदेशी मुद्रा भंडार लगभग स्थिर रहा। इससे साफ है कि भंडार के भीतर सोने का हिस्सा बढ़ाया गया है।
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भंडार में सोने की बढ़ती हिस्सेदारी
भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में अब सोने की भूमिका पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हो चुकी है। हाल के आंकड़ों के अनुसार कुल भंडार का तेरह प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा सोने का है। एक साल पहले यह आंकड़ा नौ प्रतिशत के आसपास था। यह बदलाव दिखाता है कि सोना अब सिर्फ एक अतिरिक्त संपत्ति नहीं बल्कि भारत की आर्थिक सुरक्षा का मजबूत आधार बन चुका है। कठिन समय में सोना देश को स्थिरता देने का काम कर सकता है।
दूसरे देशों का रुख क्या कहता है
दुनिया के कई देशों ने अमेरिकी सरकारी बॉन्ड में अपना निवेश बढ़ाया है। इनमें जापान ब्रिटेन और फ्रांस जैसे देश शामिल हैं। जापान अभी भी सबसे बड़ा विदेशी निवेशक बना हुआ है। लेकिन चीन भारत ब्राजील और सऊदी अरब जैसे देशों ने इसमें कटौती की है। खास तौर पर चीन का कदम काफी अहम माना जा रहा है क्योंकि उसने अपने निवेश को दो हजार आठ के बाद के सबसे निचले स्तर तक पहुंचा दिया है। यह अमेरिका पर निर्भरता घटाने की उसकी साफ नीति को दिखाता है।
क्यों बढ़ता रहेगा सोने का महत्व
चीन के पास आज भी दुनिया का सबसे बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार है। इसके बावजूद वह सोने की हिस्सेदारी बढ़ा रहा है। भारत भी उसी रास्ते पर आगे बढ़ता दिख रहा है। जब वैश्विक हालात अनिश्चित हों तब सोना देशों के लिए सबसे भरोसेमंद संपत्ति बन जाता है। यही वजह है कि आने वाले समय में भी सोने की कीमतों में मजबूती बनी रह सकती है। भारत और चीन जैसे बड़े देशों की रणनीति ने साफ कर दिया है कि सोना अब सिर्फ धातु नहीं बल्कि आर्थिक सुरक्षा की ढाल बन चुका है।