शादी हो, त्योहार हो या फिर पार्टियां—सोना हमेशा लोगों के आकर्षण का केंद्र रहा है। इसकी चमक सिर्फ आभूषणों में ही नहीं, बल्कि परंपरा, आस्था और निवेश में भी दिखाई देती है। यही कारण है कि कीमतों में रिकॉर्ड तोड़ उछाल आने के बावजूद भारतीय परिवारों का सोने के प्रति मोह कम नहीं होता। वेदों से लेकर आधुनिक समय तक सोने को शक्ति, समृद्धि और सुरक्षा का प्रतीक माना गया है। यही वजह है कि फेस्टिवल सीजन में सोने की मांग हमेशा नई ऊंचाइयों को छूती है।
त्योहारों में सोने की खरीदारी का क्रेज
धनतेरस, दिवाली और करवाचौथ जैसे त्योहार सोने की खरीदारी के शुभ समय माने जाते हैं। साल 2024 के धनतेरस पर करीब 25 टन सोना और 250 टन चांदी बिकी थी। कीमतें बढ़ने के बावजूद इस धातु की चमक कम नहीं हुई। शादी-ब्याह के सीजन में भी सोने की डिमांड तेजी से बढ़ती है।
धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व
वेदों और पुराणों में सोने को "हिरण्य" कहकर वर्णित किया गया है। ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद सभी में स्वर्ण को पवित्रता, समृद्धि और औषधीय शक्ति का प्रतीक बताया गया है। देवी लक्ष्मी का स्वरूप माना जाने वाला स्वर्ण, गृहस्थ जीवन में भी शुभता और सम्पन्नता का द्योतक है। यही कारण है कि भारतीय समाज में सोना केवल गहनों तक सीमित नहीं, बल्कि आस्था का हिस्सा है।
निवेश और आर्थिक सुरक्षा
सोना लंबे समय से सुरक्षित निवेश माना जाता है। महामारी, राजनीतिक संकट या आर्थिक अस्थिरता के दौरान इसने अन्य एसेट क्लास से बेहतर रिटर्न दिए हैं। 2020 में कोरोना महामारी के दौरान सोने ने 27% से ज्यादा रिटर्न दिए। यही वजह है कि भारतीय परिवार सेविंग्स और बच्चों की शादी जैसी जरूरतों के लिए सोना जरूर जमा करते हैं।
वैश्विक स्तर पर महत्व
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सोना आयातक है। इसे महंगाई के खिलाफ बचाव और पोर्टफोलियो संतुलन के लिए जरूरी माना जाता है। यही कारण है कि कीमतें चाहे जितनी बढ़ें, भारतीयों का सोने से मोह कभी खत्म नहीं होता।