पांढुर्णा। मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिले का विश्व प्रसिद्ध गोटमार मेला 23 अगस्त को एक बार फिर आयोजित होगा। सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी रोमांच और खौफ का संगम बनी हुई है। जाम नदी के तट पर पांढुर्णा और सावरगांव के लोग आपसी परंपरा निभाने के लिए एक-दूसरे पर पत्थर बरसाते हैं। इस अद्भुत परंपरा में भले ही खून की धाराएं बहती हों, पर लोग दर्द को भूलकर उमंग और जोश से इस परंपरा को निभाते हैं। मां चंडिका मंदिर में विशेष पूजा के बाद ही खिलाड़ी पत्थरबाजी में उतरते हैं। प्रशासन हर बार इस खतरनाक परंपरा को रोकने का प्रयास करता है, लेकिन अब तक कोई सफलता नहीं मिली। गोटमार की मिट्टी में बसी यह कहानी परंपरा और त्रासदी दोनों को साथ लेकर चलती है।
देवी चंडिका के दर्शन से शुरू होता मेला
गोटमार मेला पोलापर्व के अगले दिन मनाया जाता है। हजारों श्रद्धालु सबसे पहले मां चंडिका के मंदिर पहुंचकर पूजा-अर्चना करते हैं। परंपरा के अनुसार, मंदिर दर्शन के बाद ही पांढुर्णा और सावरगांव के लोग जाम नदी किनारे उतरकर एक-दूसरे पर पत्थरों की बारिश शुरू करते हैं।
प्रेमी युगल की दर्दनाक कथा
किवदंती के अनुसार, पांढुर्णा के युवक और सावरगांव की युवती एक-दूसरे से प्रेम करते थे। युवक युवती को लेकर पांढुर्णा आ रहा था, लेकिन जाम नदी के बीच पहुंचते ही सावरगांव के लोग पत्थर बरसाने लगे। जवाब में पांढुर्णा वालों ने भी पत्थर फेंके। इस पत्थरबाजी में प्रेमी युगल की मौत हो गई। तभी से गोटमार मेले की शुरुआत मानी जाती है।
युद्धाभ्यास से जुड़ी परंपरा
एक अन्य मान्यता के अनुसार, भोंसला राजा की फौज युद्धाभ्यास के लिए झंडा गाड़कर पत्थरबाजी का अभ्यास करती थी। यही अभ्यास धीरे-धीरे परंपरा में बदल गया और आज भी गोटमार मेला उसी परंपरा की याद दिलाता है।
खून और गम से जुड़ी परंपरा
गोटमार मेला जहां हजारों लोगों की भीड़ खींचता है, वहीं कई परिवारों के जख्म भी ताजा कर देता है। बीते वर्षों में 15 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है और सैकड़ों लोग घायल हुए हैं। किसी ने बेटा खोया, किसी ने पिता, तो किसी ने पति और भाई। इसके बावजूद परंपरा आज भी जारी है।
प्रशासन की कोशिशें नाकाम
हर साल प्रशासन सुरक्षा के कड़े इंतजाम करता है। इस बार भी कलेक्टर अजय देव शर्मा और एसपी सुंदर सिंह कनेश के नेतृत्व में लगभग 600 पुलिसकर्मी तैनात रहेंगे। शहर में धारा 144 लागू की गई है और लोगों से पत्थर न फेंकने की अपील की गई है। लेकिन इतिहास गवाह है कि चाहे रबर बॉल से रोकने की कोशिश हो या सख्त सुरक्षा, गोटमार की परंपरा अब तक नहीं रुकी।