मध्यप्रदेश के पांढुर्णा का मशहूर गोटमार मेला, जो अपनी अनूठी परंपरा और ऐतिहासिक कहानी के लिए जाना जाता है, अब बड़े परदे पर नजर आने वाला है। इस मेले की जड़ों और इसकी लोक परंपराओं को समझने के लिए मुंबई से एक विशेष दल पांढुर्णा पहुंचा है। टीम ने मां चंडिका के दर्शन कर स्थल निरीक्षण भी किया। गोटमार की कहानी, प्रेम और बलिदान से जुड़ी इस परंपरा को फिल्मी दुनिया में उतारकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने की तैयारी शुरू हो गई है।
पांढुर्णा की धरती से बड़े परदे तक
गोटमार मेला, पांढुर्णा की सांस्कृतिक पहचान माना जाता है। जाम नदी के किनारे आयोजित होने वाला यह आयोजन केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि आस्था और जनमानस की भावनाओं का प्रतीक है। फिल्म निर्माण के लिए पहुंचे दल ने स्थानीय लोगों से बातचीत कर मेले की मान्यताओं और ऐतिहासिक पहलुओं को करीब से समझा।
आराध्या मां चंडिका के दर्शन से हुई शुरुआत
फिल्म निर्माण की टीम ने पांढुर्णा पहुंचकर सबसे पहले मां चंडिका के दर्शन किए। इसके बाद गोटमार स्थल का निरीक्षण कर वहां की व्यवस्थाओं और वातावरण को समझा। दल का मानना है कि इस आयोजन की आत्मा को फिल्म में उतारना ही असली चुनौती है, ताकि दर्शकों को वास्तविक अनुभव मिल सके।
प्रेम कहानी से शुरू हुई गोटमार की परंपरा
गोटमार मेले की शुरुआत को लेकर एक मार्मिक कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि पांढुर्णा का युवक और सावरगांव की युवती एक-दूसरे से प्रेम करते थे। युवती को साथ लेकर लौटते समय दोनों जाम नदी में पहुंचे तो सावरगांव के लोग पत्थरों से हमला करने लगे। पांढुर्णा के लोगों ने भी जवाब में पत्थर बरसाए। इस संघर्ष में प्रेमी युगल की मृत्यु हो गई। तब से गोटमार मेला प्रेम, आस्था और परंपरा की याद में हर वर्ष आयोजित होता है।
आने वाली पीढ़ियों के लिए सांस्कृतिक धरोहर
फिल्म निर्माण दल का कहना है कि गोटमार पर आधारित फिल्म दर्शकों को भावनात्मक रूप से जोड़ने के साथ ही एक सांस्कृतिक दस्तावेज भी होगी। यह न सिर्फ भारत में बल्कि विश्व स्तर पर भी इस परंपरा की पहचान को नई ऊंचाई देगी।