
कान्हा की नगरी मथुरा, वृंदावन और बरसाना एक बार फिर श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर द्वापर युग की स्मृतियों को सजीव कर रही है। इस वर्ष भगवान श्रीकृष्ण का 5252वां जन्मोत्सव अत्यंत भव्यता और श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। चारों ओर उल्लास, भक्ति और रास-लीला की धुनें गूंज रही हैं। ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो सम्पूर्ण नगरी द्वापर युग में लौट गई हो। मंदिरों को फूलों, झालरों और दीपों से सजाया गया है, वहीं गलियों में कृष्ण लीलाओं की झांकियां सजाई जा रही हैं, जो श्रद्धालुओं को भगवान की बाल लीलाओं की अनुभूति करवा रही हैं।
पर्यटकों की भारी भीड़
श्रद्धालुओं और पर्यटकों की भारी भीड़ इन पावन स्थलों पर उमड़ पड़ी है। मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मस्थान मंदिर में सुरक्षा व्यवस्था के साथ-साथ अलौकिक सजावट भी आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। रात 12 बजे भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के समय विशेष आरती, भजन-संकीर्तन और शंखध्वनि से पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाएगा। वृंदावन में इस अवसर पर रासलीलाओं का मंचन हो रहा है, जिसमें कलाकार श्रीकृष्ण और राधा की प्रेमगाथा को जीवंत कर रहे हैं। नंदगांव और बरसाना में 'दही हांडी' प्रतियोगिताएं और फूलों की होली का आयोजन भी उत्सव में रंग भर रहा है।
विशेष झूला उत्सव
मंदिरों में विशेष झूला उत्सव और माखन-मिश्री का भोग लगाया जा रहा है। छोटे-छोटे बालक कृष्ण के रूप में सजकर रासलीलाओं में भाग ले रहे हैं। हर कोई श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं, गीता के उपदेशों और उनके जीवन के आदर्शों को अपने जीवन में उतारने की प्रेरणा ले रहा है। भक्तों के लिए यह सिर्फ एक पर्व नहीं, बल्कि आत्मिक अनुभव है, जो उन्हें भगवान श्रीकृष्ण के सान्निध्य का अहसास कराता है।
अध्यात्म, संस्कृति और प्रेम
इस जन्माष्टमी पर कान्हा की नगरी केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि अध्यात्म, संस्कृति और प्रेम का केंद्र बन गई है, जहां हर मोड़ पर भगवान श्रीकृष्ण की लीला, उनकी करुणा और उनका दिव्य प्रेम जीवंत हो उठा है।