ग्रेटर नोएडा। जेपी समूह के पूर्व कार्यकारी अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक मनोज गौड़ की गिरफ्तारी के बाद प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने अपनी जांच को और तेज कर दिया है। एजेंसी अब घर खरीदारों द्वारा विभिन्न परियोजनाओं में जमा कराए गए लगभग 14,599 करोड़ रुपये की उस रकम की पड़ताल कर रही है, जिसे परियोजनाओं में लगाने के बजाय कथित रूप से दूसरी कंपनियों में ट्रांसफर कर दिया गया। शुरू में यह जांच 12 हजार करोड़ रुपये तक सीमित थी, लेकिन अब यह बढ़कर 15 हजार करोड़ के करीब पहुंच गई है।
जांच में बड़ा खुलासा
ईडी की जांच में सामने आया है कि खरीदारों की भारी-भरकम रकम को आवासीय परियोजनाओं से हटाकर जेपी समूह की हेल्थकेयर, स्पोर्ट्स कंपनियों और ट्रस्ट से जुड़े उपक्रमों में भेजा गया। ईडी ने यह जांच मई माह में शुरू की थी। इसी क्रम में 23 मई को सेक्टर-128 स्थित जेपी के कॉरपोरेट और मार्केटिंग ऑफिस सहित करीब 15 ठिकानों पर छापेमारी की गई थी। टीमों ने मनोज गौड़ के आवास, गुलशन बिल्डर्स के दफ्तर और जेपी परियोजनाओं को आगे बढ़ाने वाली एजेंसी सुरक्षा के दफ्तरों में भी तलाशी ली थी। यह कार्रवाई घर खरीदारों और निवेशकों के 12,000 करोड़ रुपये के कथित फंड डायवर्जन की शिकायतों के आधार पर की गई थी।
अधूरी परियोजनाएं और निवेशकों की चिंता
नोएडा स्थित जेपी विशटाउन की 16 अधूरी परियोजनाओं में लगभग 20 हजार निवेशक जुड़े हुए हैं, जिनमें 150 से अधिक टावर शामिल हैं। अप्रैल में जेपी और सुरक्षा समूह की संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया गया था कि परियोजना क्षेत्र में 24 लाख वर्गफुट जमीन खाली पड़ी है, जिसे बेचकर निर्माण कार्य तेज किया जा सकता है। इसमें 2,900 करोड़ रुपये के खर्च और भविष्य में निवेशकों से मिलने वाले 1,200 करोड़ रुपये का अनुमान भी साझा किया गया था। इसके अतिरिक्त सुरक्षा समूह को 25 लाख वर्गफुट क्षेत्रफल वाले 1,100 रेडी-टू-सेल फ्लैट बेचने का अधिकार दिए जाने की बात भी सामने आई थी।
जांच का दायरा और बढ़ेगा
ईडी की कार्रवाई अब जेपी समूह से जुड़े उन अन्य बिल्डर्स और कारोबारी समूहों तक भी पहुंचने की संभावना है, जिनके साथ बीते वर्षों में बड़े वित्तीय लेनदेन हुए हैं। एजेंसी यह जांच कर रही है कि इन लेनदेन का उद्देश्य क्या था और क्या इनसे घर खरीदारों के हित प्रभावित हुए। खरीदारों की वर्षों पुरानी उम्मीदें और अधूरी इमारतें एक बार फिर जांच के केंद्र में हैं