वरमाला हो चुकी थी, मेहमान आशीर्वाद दे रहे थे और शादी की अगली रस्मों की तैयारी चल रही थी। तभी अचानक दूल्हा अपने पिता के साथ बारात लेकर लौट गया। वजह थी दहेज की नई मांग। मंडप में खड़ी दुल्हन ने हार मानने के बजाय हिम्मत दिखाई और सुर्ख जोड़े में ही थाने पहुंचकर शिकायत दर्ज कराई। नर्मदापुरम की यह घटना सामाजिक कुप्रथा पर फिर सवाल खड़े कर रही है।
वरमाला के बाद बदली शादी की तस्वीर
मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम में 30 जनवरी 2026 को तय हुई शादी 12 फरवरी को धूमधाम से संपन्न होनी थी। दोपहर में सगाई की रस्म हुई, जिसमें दूल्हे को सोने की अंगूठी और नगद राशि दी गई। शाम को बारात पहुंची, स्वागत हुआ और वरमाला भी संपन्न हो गई। लेकिन इसके तुरंत बाद माहौल बदल गया और मंडप में खुशियों की जगह सन्नाटा पसर गया।
3 लाख कैश और बाइक की मांग
दुल्हन पक्ष का आरोप है कि शादी से पहले ही 3 लाख रुपए नगद और एक बाइक की मांग की गई थी। परिवार ने अपनी आर्थिक स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा था कि वे सामर्थ्य अनुसार ही विवाह करेंगे। इसके बावजूद शादी वाले दिन फिर से कैश और बाइक की शर्त रखी गई। जब तत्काल व्यवस्था संभव नहीं हो सकी तो दूल्हे और उसके पिता ने शादी से इनकार कर दिया और बारात लेकर लौट गए।
उधार लेकर की थी तैयारियां
पीड़िता के परिवार का कहना है कि शादी की तैयारियां पहले ही पूरी हो चुकी थीं। रिश्तेदारों से उधार लेकर धर्मशाला बुक की गई, भोजन और अन्य व्यवस्थाएं की गईं। वर पक्ष के दबाव में कार्यक्रम को भव्य बनाने की कोशिश की गई। वरमाला के बाद जब नई मांग रखी गई तो परिवार ने बाद में देने का आग्रह भी किया, लेकिन दूल्हा और उसके पिता नहीं माने। उन्होंने पहले दिए गए गहने वापस किए और समारोह बीच में छोड़ दिया।
दुल्हन ने दिखाई हिम्मत, थाने पहुंची
शादी टूटने के बाद भी युवती ने साहस दिखाया। हाथों में मेहंदी और सुर्ख जोड़े में वह कोतवाली थाने पहुंची। वहां उसने एसआई दीपिका लोखंडे के सामने बयान दर्ज कराए। बयान देते समय वह भावुक हो गई, लेकिन उसने दहेज मांगने वालों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। पुलिस ने मामले की जांच शुरू की।
दहेज प्रतिषेध अधिनियम के तहत केस दर्ज
करीब एक सप्ताह बाद पुलिस ने दूल्हे और उसके पिता के खिलाफ दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3 और 4 के तहत प्रकरण दर्ज किया। फिलहाल मामले की विवेचना जारी है। यह घटना एक बार फिर दिखाती है कि सख्त कानून होने के बावजूद दहेज जैसी कुप्रथा समाज में जड़ें जमाए हुए है। सवाल यह है कि कब तक बेटियों के सपनों की कीमत नकद और बाइक से तय होती रहेगी?